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स्पेशल रिपोर्ट
"उत्तराखंड में गोदी मीडिया का बढ़ता प्रभाव: एक विश्लेषण"
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भूमिका
मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है।
लेकिन जब मीडिया सत्ता की गोदी में बैठ जाए, तो लोकतंत्र खतरे में आ जाता है।
उत्तराखंड में भी गोदी मीडिया की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है।
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गोदी मीडिया: परिभाषा और लक्षण
सत्ता या पूंजीपति वर्ग के हित में रिपोर्टिंग।
असुविधाजनक सच्चाइयों को छुपाना या तोड़-मरोड़ कर दिखाना।
जनता के असली सवालों से ध्यान भटकाना।
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उत्तराखंड में गोदी मीडिया की स्थिति
(क) सरकार समर्थक रिपोर्टिंग का बोलबाला
सरकारी योजनाओं का बढ़ा-चढ़ाकर प्रचार।
सरकारी विफलताओं पर चुप्पी या कमजोर कवरेज।
(ख) जन आंदोलनों की अनदेखी
पर्यावरण आंदोलनों (जैसे चारधाम परियोजना विरोध, खनन विरोध) को गलत ढंग से पेश करना।
पलायन, बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर कम कवरेज।
(ग) विज्ञापन और सरकारी मान्यता पर निर्भरता
छोटे मीडिया संस्थान भी सरकारी विज्ञापन के लिए दबाव में काम करते हैं।
(घ) स्वतंत्र पत्रकारों के लिए चुनौतियाँ
स्वतंत्र पत्रकारों को डराने, धमकाने या बदनाम करने की घटनाएँ बढ़ रही हैं।
फर्जी मुकदमों और सामाजिक बहिष्कार का खतरा।
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कुछ उदाहरण
बड़े राष्ट्रीय चैनलों द्वारा केदारनाथ पुनर्निर्माण की "भव्य" छवियाँ, लेकिन स्थानीय बेरोजगारी पर चुप्पी।
देहरादून, हरिद्वार जैसे शहरों में सरकारी परियोजनाओं की महिमामंडन रिपोर्ट्स, लेकिन गाँवों में स्वास्थ्य सेवाओं की दुर्दशा पर कोई चर्चा नहीं।
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क्या करना चाहिए?
स्वतंत्र मीडिया प्लेटफॉर्म्स का समर्थन।
मीडिया साक्षरता बढ़ाना — हर खबर की पड़ताल करना।
सरकार से सवाल पूछने वाली पत्रकारिता को मजबूती देना।
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निष्कर्ष
उत्तराखंड को बचाने के लिए केवल नदियाँ, जंगल या गाँव ही नहीं — पत्रकारिता को भी बचाना होगा।
सच्ची पत्रकारिता से ही सच्चा लोकतंत्र मजबूत होगा।
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