Monday, December 29, 2025

मजीठिया वेज बोर्ड – पत्रकारों के अधिकारों की लड़ाई अभी भी जारी



संपादकीय: मजीठिया वेज बोर्ड – पत्रकारों के अधिकारों की लड़ाई अभी भी जारी

मजीठिया वेज बोर्ड का सुप्रीम कोर्ट में फैसला पत्रकारिता के इतिहास में एक मील का पत्थर था। अदालत ने स्पष्ट किया कि पत्रकारों और समाचार पत्र कर्मचारियों के न्यूनतम वेतन और भत्तों की सिफारिशें वैध और लागू होने योग्य हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंसाल्विस की वकालत ने कर्मचारियों के अधिकारों को सुरक्षित रखने में निर्णायक भूमिका निभाई।

लेकिन, 2025 में भी यह लड़ाई पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। कई मीडिया संस्थानों में वेज बोर्ड की सिफारिशों का पूर्ण पालन नहीं हो रहा है। कर्मचारियों को अभी भी अपने बकाया वेतन और भत्तों के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। यह दर्शाता है कि कानूनी जीत के बावजूद, वास्तविक जीवन में न्याय के लिए निरंतर सतर्कता और प्रयास की आवश्यकता होती है।

मजीठिया वेज बोर्ड का मामला हमें याद दिलाता है कि पत्रकारिता केवल सूचना का आदान-प्रदान नहीं, बल्कि लोकतंत्र की रीढ़ है। जब तक पत्रकारों के अधिकार सुरक्षित नहीं होंगे, समाज में निष्पक्ष और स्वतंत्र मीडिया का सपना अधूरा रहेगा।

न्यायपालिका ने दिशा दिखा दी है, अब यह जिम्मेदारी मीडिया संस्थानों और समाज की है कि पत्रकारों के अधिकारों की पूरी रक्षा सुनिश्चित करें।

Sunday, December 28, 2025

आज के ब्राह्मण को ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी का बोध क्यों नहीं है?

आज के ब्राह्मण को ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी का बोध क्यों नहीं है?

यह प्रश्न किसी एक व्यक्ति या समुदाय पर आरोप नहीं, बल्कि एक सभ्यतागत आत्मालोचना है। सच यह है कि आज का ब्राह्मण—और केवल ब्राह्मण ही क्यों, पूरा समाज—अपने मूल दर्शन से कटा हुआ है। इसके पीछे कई कारण हैं, जिन्हें समझना ज़रूरी है।

पहला कारण—जन्म का भ्रम।
समय के साथ ब्राह्मण होना साधना से हटकर पहचान बन गया। जो दर्शन कभी ज्ञान, संयम और तप पर आधारित था, वह केवल उपनाम और परंपरा में सिमट गया। जब “होना” स्वतः मान लिया जाए, तो “बनने” की यात्रा रुक जाती है। यही कारण है कि ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी, जो आत्मचिंतन और प्रश्न की मांग करती थी, औपचारिक कर्मकांड में बदल गई।

दूसरा कारण—ग्रंथों से दूरी।
जिस परंपरा की आत्मा उपनिषद जैसे ग्रंथों में बसती है, वहाँ आज उनका पाठ नहीं, केवल उनका नाम बचा है। ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी प्रश्न पूछना सिखाती है—“मैं कौन हूँ?”, “सत्य क्या है?”—लेकिन आज अधिकांश धार्मिक शिक्षा उत्तर रटाने तक सीमित है। प्रश्नों से डर और जिज्ञासा का अभाव बोध को जन्म ही नहीं लेने देता।

तीसरा कारण—कर्मकांड का वर्चस्व।
दर्शन कठिन है, कर्मकांड आसान। दर्शन विवेक माँगता है, कर्मकांड केवल अभ्यास। धीरे-धीरे ब्राह्मण की भूमिका समाज के पथप्रदर्शक से घटकर अनुष्ठान कराने वाले पेशेवर की बन गई। जब ज्ञान का स्थान प्रक्रिया ले ले, तब बोध खो जाता है।

चौथा कारण—सत्ता से समझौता।
इतिहास में कई दौर ऐसे आए जब ब्राह्मण वर्ग ने सत्ता से दूरी रखने के बजाय उससे समझौता किया। परिणामस्वरूप दर्शन निर्भीक नहीं रहा। जबकि ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी का मूल स्वर सत्ता से प्रश्न करना था—जैसा कि आदि शंकराचार्य ने अपने समय में किया। आज वह साहस कम दिखाई देता है।

पाँचवाँ कारण—आधुनिकता का अधूरा बोध।
आज का ब्राह्मण न पूरी तरह परंपरा में है, न पूरी तरह आधुनिक विवेक में। पश्चिमी आधुनिकता उसने उपभोग में अपनाई, लेकिन आलोचनात्मक चिंतन में नहीं; और परंपरा उसने रस्मों में बचाई, दर्शन में नहीं। इस दोराहे पर खड़ा व्यक्ति स्वाभाविक रूप से बौध से दूर हो जाता है।

निष्कर्ष
आज के ब्राह्मण को ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी का बोध इसलिए नहीं है क्योंकि उसने ब्राह्मण होने को विरासत और ब्राह्मण बनने की साधना छोड़ दी है।
बोध किसी जाति से नहीं, चेतना के श्रम से आता है।
जिस दिन ब्राह्मण फिर से प्रश्न करेगा, सत्ता से दूरी रखेगा, और ज्ञान को जीवन में उतारेगा—उसी दिन यह दर्शन पुनर्जीवित होगा।

यह संकट किसी एक वर्ग का नहीं, पूरे समाज का है। क्योंकि जब मार्गदर्शक ही मार्ग भूल जाए, तो यात्रा भटकना तय है।

ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी: जन्म नहीं, बोध की परंपरा

ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी: जन्म नहीं, बोध की परंपरा

आज “ब्राह्मण” शब्द आते ही बहस खड़ी हो जाती है। कोई इसे विशेषाधिकार से जोड़ता है, कोई वर्चस्व से। लेकिन इस शोर में वह मूल विचार गुम हो गया है जिसे ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी कहा जाता है। यह दर्शन किसी जाति का प्रमाणपत्र नहीं, बल्कि ब्रह्म को जानने की बौद्धिक–नैतिक यात्रा है।

भारतीय दर्शन की परंपरा में ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी का आधार वेद और उपनिषद हैं। इन ग्रंथों में ब्राह्मण का अर्थ है—जो प्रश्न करता है, जो सत्य की खोज में जीवन को तपस्या बनाता है। “अहं ब्रह्मास्मि” जैसी उक्ति यह स्पष्ट करती है कि परम सत्य बाहर नहीं, चेतना के भीतर खोजा जाना है।

यह दर्शन ज्ञान को सर्वोच्च मानता है। यहाँ सत्ता, संपत्ति या जन्म नहीं, बल्कि विवेक और बोध निर्णायक हैं। इसलिए ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी समाज को निर्देश देती है कि अंधविश्वास नहीं, प्रश्न पूछो; अनुकरण नहीं, आत्मबोध करो। यही कारण है कि यह परंपरा केवल धार्मिक नहीं, गहराई से दार्शनिक और नैतिक है।

ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी का शिखर रूप अद्वैत वेदांत में दिखाई देता है, जिसे व्यवस्थित स्वरूप दिया आदि शंकराचार्य ने। अद्वैत का संदेश सीधा है—जीव और ब्रह्म में भेद अज्ञान से है, ज्ञान से नहीं। जब यह समझ आती है, तब ऊँच–नीच, मैं–तुम, अपना–पराया अपने आप ढह जाते हैं।

दुर्भाग्य यह है कि समय के साथ इस दर्शन को जन्म आधारित श्रेष्ठता में बदल दिया गया। यही विकृति “ब्राह्मणवाद” कहलाती है, जिसने दर्शन को सत्ता का औज़ार बना दिया। परिणाम यह हुआ कि जो परंपरा समाज को दिशा देने वाली थी, वही समाज को बाँटने का माध्यम बन गई।

आज के भारत में, जब धर्म का उपयोग राजनीति और ध्रुवीकरण के लिए हो रहा है, तब ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी की मूल आत्मा और अधिक प्रासंगिक हो जाती है। यह हमें याद दिलाती है कि धर्म आचरण है, प्रदर्शन नहीं; और ब्राह्मण होना अधिकार नहीं, उत्तरदायित्व है—सत्य बोलने का, अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का, और समाज को विवेक की ओर ले जाने का।

निष्कर्षतः, ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी किसी एक समुदाय की जागीर नहीं। यह चेतना की वह ऊँचाई है जहाँ पहुँचना हर मनुष्य के लिए संभव है। जो सत्य की खोज करे, जो ज्ञान को जीवन में उतारे—वही इस दर्शन की सच्ची परिभाषा है।

ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी के मूल स्तंभ

ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी कोई जातीय श्रेष्ठता का सिद्धांत नहीं, बल्कि जीवन–ब्रह्म–ज्ञान को समझने की एक दार्शनिक परंपरा है। इसका केंद्र “कौन जन्म से क्या है” नहीं, बल्कि “कौन कर्म, ज्ञान और आचरण से क्या बनता है” — यही इसका मूल है।


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ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी के मूल स्तंभ

1️⃣ ब्रह्म की खोज

ब्राह्मण दर्शन का केंद्रीय प्रश्न है— ब्रह्म क्या है?
यानी वह परम सत्य जो सृष्टि, चेतना और अस्तित्व का आधार है।
यह विचार हमें वेद और विशेष रूप से उपनिषद में मिलता है—

> “अहं ब्रह्मास्मि” — मैं ही ब्रह्म हूँ।




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2️⃣ ज्ञान को सर्वोच्च मान

ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी में ज्ञान (ज्ञानयोग) को मुक्ति का मार्ग माना गया है—
धन, सत्ता या जन्म नहीं, बल्कि बोध और विवेक।

यही कारण है कि यह दर्शन प्रश्न करना सिखाता है—

> क्यों? कैसे? सत्य क्या है?




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3️⃣ कर्म और आचरण

यह दर्शन केवल विचार नहीं, जीवन-पद्धति है।
ब्राह्मण वही है जो—

सत्य बोले

संयम रखे

लोभ से मुक्त हो

समाज को दिशा दे


यानी ब्राह्मण होना कर्तव्य है, अधिकार नहीं।


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4️⃣ अद्वैत की दृष्टि

ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी का शिखर है अद्वैत वेदांत —
जिसे व्यवस्थित रूप दिया आदि शंकराचार्य ने।

इसका सार—

> जीव और ब्रह्म अलग नहीं हैं।
भेद अज्ञान से है, ज्ञान से एकता प्रकट होती है।




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ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी बनाम ब्राह्मणवाद

यहीं सबसे बड़ा भ्रम पैदा हुआ—

ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी → ज्ञान, तप, नैतिकता, प्रश्न

ब्राह्मणवाद (विकृत रूप) → जन्म, प्रभुत्व, अहंकार


जब दर्शन सत्ता का औज़ार बनता है, तब उसका पतन होता है।


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आज के संदर्भ में

आज जब—

धर्म राजनीति बन रहा है

ज्ञान की जगह शोर है

आस्था का उपयोग नफ़रत के लिए हो रहा है


तब ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी हमें याद दिलाती है—

> धर्म धारण करने की वस्तु है,
दूसरों पर थोपने की नहीं।




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निष्कर्ष

ब्राह्मण फ़िलोसॉफ़ी जन्म की नहीं, चेतना की पहचान है।
जो सत्य की खोज करे, वही ब्राह्मण—
चाहे वह किसी भी जाति, वर्ग या समय का हो।


इतिहास का कथन, वर्तमान का सबक

इतिहास का कथन, वर्तमान का सबक

(संपादकीय)

1919 में यदि औपनिवेशिक सत्ता के प्रतिनिधि Lord Chelmsford से जुड़ा यह कथन— “ब्राह्मणों में नायकत्व नहीं होता”—कहा या प्रचारित किया गया, तो वह केवल उस दौर की राजनीतिक चाल नहीं थी। वह एक सोची-समझी रणनीति थी—समाज को बाँटो, नेतृत्व को कमज़ोर करो और सत्ता को सुरक्षित रखो।

दुखद सच्चाई यह है कि एक सदी बाद भी यह रणनीति बदली नहीं है, केवल शासक बदल गए हैं, तरीके आधुनिक हो गए हैं।

आज भी नायकत्व को परिभाषित करने का ठेका कुछ खास खाँचों ने ले रखा है। कोई जाति, कोई वर्ग, कोई विचारधारा—सबको प्रमाणपत्र बाँटे जा रहे हैं कि कौन “नेतृत्व के योग्य” है और कौन नहीं। फर्क बस इतना है कि 1919 में यह काम विदेशी सत्ता करती थी, आज यह काम हम अपने ही समाज के भीतर से कर रहे हैं।

वर्तमान भारत में जब भी कोई वर्ग सवाल पूछता है, तर्क देता है, संविधान की भाषा बोलता है—उसे तुरंत किसी न किसी लेबल में बंद कर दिया जाता है।

कभी “एलीट”

कभी “अर्बन नक्सल”

कभी “जातिवादी”


यह वही मानसिकता है, जो कभी “नायकत्व नहीं होता” जैसे वाक्यों में व्यक्त हुई थी।

आज नेतृत्व को भी केवल शोर, शक्ति और आक्रामकता से जोड़ दिया गया है। शांत विवेक, वैचारिक गहराई और नैतिक साहस को कमजोरी समझा जाने लगा है। यह सोच लोकतंत्र के लिए उतनी ही खतरनाक है, जितनी औपनिवेशिक शासन के लिए राष्ट्रीय चेतना खतरनाक थी।

इतिहास गवाह है—जब भी समाज ने नायकत्व को संकीर्ण परिभाषाओं में कैद किया, तब-तब वह बाहरी या भीतरी सत्ता के हाथों खिलौना बना। 1919 में अंग्रेज़ों ने यह प्रयोग किया था, आज हम वही प्रयोग स्वयं पर दोहरा रहे हैं।

सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि किस जाति या वर्ग में नायकत्व है।
असल सवाल यह है—क्या हम विचार आधारित नेतृत्व से डरने लगे हैं?
क्या हम अब भी यह तय करना चाहते हैं कि कौन नेतृत्व करेगा, और कौन केवल अनुसरण?

1919 का कथन हमें चेतावनी देता है—नायकत्व को जाति, वर्ग या पहचान से जोड़ना सत्ता के लिए तो सुविधाजनक हो सकता है, लेकिन समाज के लिए यह हमेशा विनाशकारी सिद्ध हुआ है।

इतिहास केवल पढ़ने के लिए नहीं होता।
इतिहास इसलिए होता है ताकि हम वही गलती दोबारा न करें—
जिसे कभी किसी वायसराय ने हमारे लिए रचा था,
और जिसे आज हम स्वयं अपने लिए रच रहे हैं।

“धर्म को धारण करना चाहिए, धर्म का नशा नहीं करना चाहिए।”

“धर्म को धारण करना चाहिए, धर्म का नशा नहीं करना चाहिए।”

धर्म का अर्थ है—जो हमें धारण करे, जो हमारे आचरण, करुणा और विवेक को संभाले।
पर जब धर्म नशा बन जाता है, तब वह हमें नहीं संभालता—हम दूसरों को कुचलने लगते हैं।

धर्म का नशा आदमी को इतना मदहोश कर देता है कि
वह ईश्वर की जगह स्वयं को उसका ठेकेदार समझने लगता है।
फिर सत्य नहीं, केवल पहचान बचती है;
करुणा नहीं, केवल क्रोध बोलता है।

धर्म को धारण करने वाला व्यक्ति
शांत होता है, सहिष्णु होता है, प्रश्न करता है।
वहीं धर्म का नशा करने वाला
भीड़ बनाता है, दुश्मन खोजता है और हिंसा को आस्था कहता है।

सच्चा धर्म
हाथ में शस्त्र नहीं,
हृदय में संवेदना देता है।
वह दूसरों को बदलने नहीं,
खुद को बेहतर बनाने की प्रेरणा देता है।

धर्म यदि हमें
अहंकारी, कठोर और असहिष्णु बना दे—
तो समझ लेना चाहिए कि
हमने धर्म नहीं, नशा कर लिया है।

धर्म वह है जो
मनुष्य को मनुष्य बनाए।
बाक़ी सब—केवल शोर है।

Saturday, December 27, 2025

चुप्पी भी एक अपराध

 

संपादकीय | चुप्पी भी एक अपराध

अंकिता भंडारी हत्याकांड एक बार फिर से सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में है। कारण है—मामले में वीआईपी नाम का सामने आना। लेकिन इससे भी अधिक चिंताजनक है, इस खुलासे के बाद संविधानिक संस्थाओं की चुप्पी, विशेषकर उत्तराखंड महिला आयोग का इस पर संज्ञान न लेना।

यह सवाल केवल एक व्यक्ति या एक बयान का नहीं है। यह सवाल उस व्यवस्था का है, जो महिलाओं के अधिकारों की रक्षा का दावा करती है, लेकिन जब सत्ता के गलियारों तक मामला पहुंचता है, तो वही व्यवस्था मौन साध लेती है।

अंकिता एक आम लड़की थी—न सत्ता में, न प्रभाव में। उसकी हत्या पहले ही प्रदेश और देश की न्यायिक संवेदना को झकझोर चुकी है। ऐसे में यदि अब किसी वीआईपी की भूमिका को लेकर सवाल उठते हैं, तो यह महिला आयोग जैसे संस्थानों की नैतिक और संवैधानिक जिम्मेदारी बनती है कि वे स्वतः संज्ञान लें, निष्पक्ष जांच की मांग करें और पीड़िता के पक्ष में मजबूती से खड़ी हों।

लेकिन जब ऐसा नहीं होता, तो संदेश स्पष्ट जाता है—
कि न्याय की रेखा प्रभावशाली और साधारण के बीच कहीं धुंधली हो जाती है।

महिला आयोग का मौन केवल प्रशासनिक उदासीनता नहीं, बल्कि संस्थागत साहस की कमी को उजागर करता है। आयोग का गठन सिर्फ औपचारिकता के लिए नहीं हुआ है; उसका उद्देश्य है—जहाँ व्यवस्था डगमगाए, वहाँ हस्तक्षेप करना।

आज जरूरत है कि इस मामले में:

  • सभी दावों की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच हो

  • किसी भी प्रभावशाली नाम को जांच से बाहर न रखा जाए

  • महिला आयोग जैसी संस्थाएं अपनी भूमिका को पुनः स्थापित करें

क्योंकि अगर सत्ता के नाम पर संवेदनशील मामलों में भी संस्थाएं खामोश रहेंगी, तो सवाल केवल अंकिता के लिए नहीं उठेगा—सवाल हर उस बेटी के लिए होगा, जो न्याय की उम्मीद लेकर व्यवस्था की ओर देखती है।

न्याय केवल फैसलों से नहीं, साहसिक हस्तक्षेप से भी जिंदा रहता है।
और चुप्पी—कई बार सबसे बड़ा अपराध बन जाती है।

Friday, December 26, 2025

बड़े मन की राजनीति

बड़े मन की राजनीति

अटल जी की जयंती पर सभी नेता कार्यकर्ता ने उन्हें याद किया जगह जगह राजनीतिक भाषण हुए पर उनको सच्चे मन से अनुसरण करने वाले बहुत कम दिखे, कौन उनके वास्तविक राजनीतिक उत्तराधिकारी हैं आओ जानते हैं उनके बड़े मन की राजनीति बात।

“छोटे मन से कोई बड़ा नहीं होता, टूटे मन से कोई खड़ा नहीं होता”—यह पंक्ति अटल बिहारी वाजपेयी की है, और शायद इसी एक वाक्य में उनके पूरे सार्वजनिक जीवन का सार छिपा है।

आज के समय में जब राजनीति और समाज दोनों ही असहिष्णुता, त्वरित प्रतिक्रिया और सतही जीत की होड़ में उलझे दिखते हैं, यह पंक्ति हमें ठहरकर सोचने को मजबूर करती है। अटल जी का मानना था कि नेतृत्व का कद भाषणों से नहीं, मन की विशालता से तय होता है। संकीर्ण सोच के साथ सत्ता मिल भी जाए, तो वह इतिहास नहीं रचती—केवल शोर पैदा करती है।

दूसरी पंक्ति और भी गहरी है—“टूटे मन से कोई खड़ा नहीं होता।” यह केवल व्यक्तिगत अवसाद की बात नहीं, बल्कि सामाजिक हताशा का संकेत है। जब नागरिक बार-बार अपमानित हों, उनकी बात सुनी न जाए, और असहमति को अपराध बना दिया जाए, तो मन टूटते हैं। ऐसे में विकास के आंकड़े खड़े हो सकते हैं, लेकिन समाज खुद खड़ा नहीं रह पाता।

अटल जी की राजनीति संवाद की राजनीति थी। विरोधियों के प्रति सम्मान और लोकतांत्रिक मर्यादाओं के प्रति प्रतिबद्धता उनकी पहचान थी। वे जानते थे कि मन तोड़कर भीड़ तो जुटाई जा सकती है, लेकिन राष्ट्र नहीं बनाया जा सकता।

आज ज़रूरत इस बात की है कि हम फिर से उस राजनीति और उस सामाजिक सोच की ओर लौटें जहाँ बड़ा बनने की शर्त दूसरों को छोटा करना नहीं, बल्कि मन को बड़ा करना हो। क्योंकि अंततः देश वही आगे बढ़ता है, जिसके नागरिक आत्मसम्मान के साथ खड़े हों—और टूटे मनों के सहारे कोई भविष्य नहीं बनता।

सबको अपने हिस्से की भूख मिलती है, पर सबको अपने हिस्से का भात नहीं मिलता

सबको अपने हिस्से की भूख मिलती है, पर सबको अपने हिस्से का भात नहीं मिलता

यह पंक्ति किसी कविता का अलंकार नहीं, बल्कि हमारे समय का नंगा सच है। भूख किसी भेदभाव को नहीं मानती। वह अमीर के पेट में भी उठती है और गरीब की आँतों में भी। फर्क सिर्फ इतना है कि किसी के सामने थाली रख दी जाती है और किसी के सामने केवल प्रतीक्षा।

आज देश में अनाज की कमी नहीं है। सरकारी आँकड़े बताते हैं कि गोदाम भरे हैं, उत्पादन रिकॉर्ड तोड़ रहा है और योजनाएँ काग़ज़ों पर सफल हैं। इसके बावजूद एक बड़ा वर्ग ऐसा है, जो रोज़ अपने हिस्से की भूख के साथ सोता है। यह विरोधाभास बताता है कि समस्या भूख की नहीं, व्यवस्था की है।

किसान खेत में पसीना बहाता है, मज़दूर ईंट-गारा ढोता है, श्रमिक शहरों की नींव उठाता है—लेकिन सबसे पहले वही भात से वंचित रह जाता है। भूख उसकी नियति बना दी गई है और भात किसी और का अधिकार। यह सामाजिक असमानता का सबसे क्रूर रूप है, जहाँ मेहनत और भोजन के बीच की कड़ी तोड़ दी गई है।

भूख केवल पेट तक सीमित नहीं रहती। वह आत्मसम्मान, शिक्षा और भविष्य को भी निगल जाती है। भूखा बच्चा स्कूल में सीख नहीं पाता, भूखा युवा व्यवस्था पर विश्वास खो देता है और भूखा समाज धीरे-धीरे भीतर से टूटने लगता है। यह सिर्फ मानवीय संकट नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक विफलता भी है।

सबसे खतरनाक स्थिति तब होती है जब समाज भूख का आदी हो जाता है—जब खाली थाली को सामान्य मान लिया जाता है और इसे भाग्य या मजबूरी कहकर टाल दिया जाता है। यहीं से संवेदना मरने लगती है और नीति केवल आंकड़ों तक सिमट जाती है।

अब समय आ गया है कि भूख को दया का विषय नहीं, अधिकार का प्रश्न माना जाए। भोजन कोई उपकार नहीं, जीवन का मूल अधिकार है। जब तक हर व्यक्ति को उसके हिस्से का भात नहीं मिलेगा, तब तक विकास, समृद्धि और प्रगति जैसे शब्द खोखले ही रहेंगे।

क्योंकि किसी भी सभ्य समाज की पहचान उसके गोदामों से नहीं, बल्कि उसकी थालियों से होती है।

“अपने को बताना कोई अध्यात्म नहीं, दूसरे को जानना अध्यात्म है।”



“अपने को बताना कोई अध्यात्म नहीं, दूसरे को जानना अध्यात्म है।”

अक्सर हम अध्यात्म को स्व-प्रचार या स्व-घोषणा समझ लेते हैं—
कि मैंने यह साधना की, मुझे यह अनुभूति हुई, मैं यह जानता हूँ।
पर यह अहं का विस्तार है, अध्यात्म नहीं।

सच्चा अध्यात्म वहाँ शुरू होता है जहाँ
मैं पीछे हटता है और तू सामने आता है।

दूसरे को जानना मतलब—

उसके दुःख को बिना उपदेश दिए समझ लेना

उसकी चुप्पी को सुन लेना

उसकी कमज़ोरी में उसे तौलना नहीं, थाम लेना


जब आप किसी को जज नहीं करते, बल्कि समझते हैं—
तभी भीतर का ज्ञान जागता है।

अपने बारे में बोलना जानकारी है,
दूसरे के लिए संवेदना रखना चेतना है।

और यही चेतना अध्यात्म का मूल है।

Monday, December 22, 2025

संपादकीय | पहाड़ निशाने पर क्यों हैं?

 

संपादकीय | पहाड़ निशाने पर क्यों हैं?

क्यों पहाड़ियों के पीछे पड़े हो?
यह सवाल आज सिर्फ़ एक समुदाय का नहीं, बल्कि पूरे देश की विकास-दृष्टि पर प्रश्नचिह्न है। पहाड़ इसलिए निशाने पर हैं क्योंकि वे अब पहले जैसे प्रहरी नहीं रहे—न अपने जंगलों के, न अपनी ज़मीन के, न अपने भविष्य के।

एक समय था जब पहाड़ी समाज खुद अपनी रक्षा-रेखा था। जंगल कटता तो आवाज़ उठती थी, नदी रोकी जाती तो विरोध होता था, ज़मीन छीनी जाती तो संघर्ष खड़ा हो जाता था। आज वही समाज रोज़गार की मजबूरी, पलायन, और राजनीतिक उपेक्षा के चलते बिखर चुका है। प्रहरी कमजोर नहीं हुआ, उसे अकेला छोड़ दिया गया

अरावली की स्थिति इस सच्चाई की गवाही देती है। जब किसी पहाड़ी श्रृंखला को सिर्फ़ खनन, रियल एस्टेट और त्वरित मुनाफ़े की नज़र से देखा जाता है, तो वह पहाड़ नहीं, मलबा बन जाती है। अरावली आज चेतावनी है—कल उत्तराखंड का आईना। फर्क बस इतना है कि यहाँ आपदा भूस्खलन बनकर आती है, वहाँ धूल बनकर उड़ती है।

उत्तराखंड का पहाड़ी आज ना घर का रहा, ना घाट का
गाँव उजड़ गए, शहरों ने अपनाया नहीं।
खेती छूटी, नौकरी मिली नहीं।
संस्कृति पीछे छूट गई, पहचान अधूरी रह गई।

यह त्रासदी किसी प्राकृतिक आपदा का परिणाम नहीं, बल्कि नीतिगत अंधेपन का नतीजा है। विकास के नाम पर पहाड़ को संसाधन समझा गया, समाज नहीं। सड़कें बनीं, पर रोज़गार नहीं। परियोजनाएँ आईं, पर स्थानीय भागीदारी नहीं। फैसले हुए, पर पहाड़ से पूछकर नहीं।

असल सवाल यह नहीं कि पहााड़ियों के पीछे क्यों पड़े हो,
असल सवाल यह है कि पहााड़ी खुद अपने पीछे क्यों नहीं खड़े हो रहे?

जब तक पहाड़ के मुद्दे चुनावी एजेंडा नहीं बनेंगे,
जब तक पर्यावरण, पलायन, स्थानीय रोजगार और भूमि अधिकार नीति के केंद्र में नहीं आएँगे,
और जब तक पहाड़ी समाज खुद संगठित होकर सवाल नहीं पूछेगा—
तब तक पहाड़ सिर्फ़ भावनाओं में जिएगा, नीतियों में नहीं।

आज ज़रूरत है पहाड़ को बचाने की नहीं,
पहाड़ को फिर से प्रहरी बनाने की।
वरना आने वाली पीढ़ियाँ पूछेंगी—
जब पहाड़ ढह रहा था, तब हम चुप क्यों थे?

Sunday, December 21, 2025

जब पत्रकार ही खबरों की हत्या करने लगें

संपादकीय | जब पत्रकार ही खबरों की हत्या करने लगें

लोकतंत्र की सबसे मज़बूत नींव स्वतंत्र और निर्भीक पत्रकारिता मानी जाती है। कहा जाता है कि पत्रकार समाज की आँख और कान होता है, जो सत्ता के अंधेरे को उजाले में लाता है। लेकिन सवाल यह है कि जब यही पत्रकार सच को दफना दे, खबरों की हत्या कर दे, तो लोकतंत्र का क्या होगा?

आज “खबर न चलाने” की संस्कृति केवल चूक नहीं, बल्कि एक सुनियोजित अपराध बनती जा रही है। दबाव, प्रलोभन, भय या सौदेबाज़ी के कारण जब जनहित से जुड़ी सूचनाएँ जनता तक नहीं पहुँचतीं, तब यह केवल पत्रकारिता का पतन नहीं, बल्कि जनता के सूचना के अधिकार की हत्या है।

संविधान ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी है, लेकिन यह स्वतंत्रता जिम्मेदारी के साथ आती है। अनुच्छेद 19(1)(a) पत्रकार को बोलने का अधिकार देता है, पर अनुच्छेद 19(2) यह भी स्पष्ट करता है कि यह अधिकार जनहित के विरुद्ध नहीं हो सकता। जब कोई पत्रकार जानबूझकर सच छिपाता है, तो वह इस अधिकार का दुरुपयोग करता है।

दुर्भाग्यपूर्ण सच्चाई यह है कि भारत में खबरों की हत्या को सीधे अपराध मानने वाला कोई स्पष्ट कानून नहीं है। हाँ, परिस्थितियों के अनुसार भारतीय दंड संहिता, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम या सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत कार्रवाई संभव है, लेकिन यह सब अप्रत्यक्ष और सीमित है।

प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया जैसी संस्थाएँ नैतिक निंदा तो कर सकती हैं, पर दंड देने की शक्ति उनके पास नहीं है। यही कारण है कि खबरों की हत्या करने वाले अक्सर बेखौफ रहते हैं।

यह स्थिति लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक है। क्योंकि अगर खबरें बिकने लगें, दबने लगें या सौदों का हिस्सा बन जाएँ, तो जनता सच और झूठ में फर्क कैसे करेगी? सत्ता से सवाल कौन पूछेगा?

अब समय आ गया है कि देश यह तय करे—
क्या खबर दबाना सिर्फ अनैतिक कृत्य है या जनहित के खिलाफ अपराध?

ज़रूरत है:

खबर दबाने और जानबूझकर सूचना छिपाने को दंडनीय अपराध घोषित करने की

एक स्वतंत्र मीडिया लोकपाल की

और पत्रकारिता में पारदर्शिता व जवाबदेही सुनिश्चित करने की


क्योंकि अगर पत्रकार ही सच का गला घोंटने लगे,
तो याद रखना चाहिए—
खबरों की हत्या के बाद, बारी लोकतंत्र की होती है।

Friday, December 19, 2025

जैन धर्म: क्षत्रिय जन्म, परंतु कर्म प्रधान दर्शन

lसंपादकीय | जैन धर्म: क्षत्रिय जन्म, परंतु कर्म प्रधान दर्शन

भारतीय धार्मिक परंपरा में जैन धर्म को अक्सर किसी एक सामाजिक वर्ग से जोड़कर देखा जाता है। यह प्रश्न बार-बार उठता है कि क्या जैन धर्म क्षत्रिय कुल से जुड़ा हुआ था, और यदि हाँ, तो आज जैन समाज में व्यापारी वर्ग की प्रधानता क्यों दिखाई देती है। इस प्रश्न का उत्तर इतिहास, दर्शन और सामाजिक विकास—तीनों को साथ रखकर समझना आवश्यक है।

जैन परंपरा के अनुसार अंतिम तीर्थंकर महावीर स्वामी क्षत्रिय कुल में जन्मे थे। उनके पिता राजा सिद्धार्थ और माता रानी त्रिशला थीं। इसी प्रकार प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव को भी इक्ष्वाकु वंश का क्षत्रिय राजा माना जाता है। जैन ग्रंथों में अधिकांश तीर्थंकरों का संबंध राजवंशों से बताया गया है। इस दृष्टि से यह कहना ऐतिहासिक रूप से गलत नहीं कि तीर्थंकरों का जन्म क्षत्रिय कुलों में हुआ।

लेकिन यहीं पर एक बड़ी भ्रांति जन्म लेती है। जैन धर्म जन्म आधारित श्रेष्ठता को नहीं, बल्कि कर्म आधारित उन्नति को स्वीकार करता है। जैन दर्शन का मूल सिद्धांत है—आत्मा स्वतंत्र है, शुद्ध है और अपने कर्मों से बंधती तथा मुक्त होती है। न तो कोई ईश्वर किसी को ऊँचा-नीचा बनाता है और न ही जन्म किसी को मोक्ष का अधिकारी या अयोग्य ठहराता है।

महावीर स्वामी स्वयं इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। वे राजा थे, परंतु उन्होंने राजसत्ता, वैभव और कुल-गौरव को त्यागकर संयम और तप का मार्ग चुना। जैन धर्म में राजा का महत्व उसके सिंहासन से नहीं, बल्कि उसके त्याग से तय होता है। यही कारण है कि जैन परंपरा में साधु सर्वोच्च आदर्श है—वह चाहे किसी भी कुल में जन्मा हो।

समय के साथ सामाजिक परिस्थितियाँ बदलीं। युद्ध, हिंसा और सत्ता संघर्ष से दूरी बनाए रखने के लिए जैन समाज ने ऐसे व्यवसाय अपनाए जो अहिंसा के अधिक अनुकूल थे। व्यापार, लेखा, शिक्षा और दान—ये क्षेत्र जैन मूल्यों से सहज रूप से मेल खाते थे। परिणामस्वरूप जैन समाज में वैश्य वर्ग की संख्या बढ़ी। यह परिवर्तन धार्मिक आदेश नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और नैतिक चयन था।

आज आवश्यकता इस बात की है कि जैन धर्म को किसी जाति या वर्ग के खांचे में बंद न किया जाए। जैन धर्म का संदेश स्पष्ट है—अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह और आत्मसंयम। यह संदेश हर मनुष्य के लिए है, चाहे वह किसी भी कुल, वर्ग या पृष्ठभूमि से आता हो।

अंततः कहा जा सकता है कि जैन धर्म की जड़ें भले ही क्षत्रिय राजपरिवारों में दिखाई देती हों, लेकिन उसकी शाखाएँ और फल समस्त मानवता के लिए हैं। यह धर्म सत्ता से नहीं, साधना से; जन्म से नहीं, कर्म से; और बाहरी पहचान से नहीं, आंतरिक शुद्धता से मनुष्य का मूल्य तय करता है। यही जैन दर्शन की सबसे बड़ी प्रासंगिकता और शक्ति है।

Thursday, December 18, 2025

विरोध से परिपक्वता तक

संपादकीय | विरोध से परिपक्वता तक

“मुख़ालिफ़त से मिरी शख़्सियत सँवरती है,
मैं दुश्मनों का बड़ा एहतिराम करता हूँ!”
यह पंक्तियाँ केवल शायरी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक चेतना का घोषवाक्य हैं। आज के दौर में, जहाँ असहमति को देशद्रोह और सवाल को साज़िश मान लिया जाता है, वहाँ यह सोच एक ज़रूरी हस्तक्षेप है।

लोकतंत्र का मूल स्वभाव ही प्रश्न करना है। सत्ता, समाज और विचार—तीनों तभी स्वस्थ रहते हैं जब उन पर सवाल उठते रहें। इतिहास गवाह है कि जिन व्यवस्थाओं ने आलोचना से मुँह मोड़ा, वे आत्ममुग्धता का शिकार होकर अंततः ढह गईं। इसके उलट, जिन समाजों ने विरोध को सुना, बहस को जगह दी और असहमति को सम्मान दिया, वे समय के साथ अधिक मज़बूत हुए।

आज दुर्भाग्य यह है कि विरोध करने वाला “दुश्मन” बना दिया जाता है। असहमति रखने वाला नागरिक नहीं, बल्कि “एजेंडा” माना जाता है। सोशल मीडिया से लेकर संसद तक, भाषा में शिष्टता की जगह कटुता ने ले ली है। नतीजा यह कि संवाद टूट रहा है और लोकतंत्र शोर में बदलता जा रहा है।

वास्तव में विरोधी वह आईना होता है जो हमारी कमज़ोरियाँ दिखाता है। आलोचक वह शिक्षक है जो बिना शुल्क लिए हमें बेहतर बनने का अवसर देता है। जो व्यक्ति या सत्ता अपने आलोचकों का सम्मान करना सीख लेती है, वही परिपक्व कहलाने की हक़दार होती है। आत्मविश्वास तालियों से नहीं, सवालों से बनता है।

इसलिए ज़रूरत है कि हम विरोध को सहन करना नहीं, स्वीकार करना सीखें। असहमति से डरने के बजाय उससे संवाद करें। क्योंकि जो समाज अपने “दुश्मनों” का सम्मान करना जानता है, वही वास्तव में अपने लोकतंत्र की रक्षा करता है।

आज के भारत में यह सोच सिर्फ़ साहित्यिक सौंदर्य नहीं, बल्कि एक राजनीतिक और सामाजिक आवश्यकता है। विरोध से सँवरने की क्षमता ही हमें भीड़ से नागरिक और सत्ता से लोकतंत्र बनाती है।

Tuesday, December 16, 2025

कर्ज़ की राजनीति और आम आदमी का आत्मविश्वास

संपादकीय | कर्ज़ की राजनीति और आम आदमी का आत्मविश्वास

देश के प्रधानमंत्री जब विदेश यात्रा पर निकलते हैं, तो वह केवल राजनयिक दौरा नहीं होता, बल्कि आर्थिक आत्मविश्वास का सार्वजनिक प्रदर्शन भी होता है। निवेश, रणनीतिक साझेदारी और वैश्विक मंचों पर भारत की मौजूदगी—इन सबका संदेश यही होता है कि देश आगे बढ़ रहा है। इसी बीच देश और राज्यों पर बढ़ते कर्ज़ के आँकड़े भी सामने आते हैं। हैरानी यह है कि इन आँकड़ों के बावजूद व्यवस्था निर्बाध चलती रहती है। सरकारें आश्वस्त हैं, योजनाएँ जारी हैं और घोषणाओं का सिलसिला थमता नहीं।

यही दृश्य आम नागरिक के मन में एक अजीब-सा आत्मविश्वास पैदा करता है। जब देश और प्रदेश कर्ज़ लेकर विकास का दावा कर सकते हैं, तो आम आदमी भी अपने सीमित दायरे में वही तर्क अपनाने लगता है। घरेलू बजट हो या व्यक्तिगत जीवन—उधार अब संकट नहीं, बल्कि ‘मैनेजमेंट’ का हिस्सा बनता जा रहा है। फर्क सिर्फ पैमाने का है, सोच की दिशा एक जैसी होती जा रही है।

सरकारें कर्ज़ को भविष्य के निवेश के रूप में प्रस्तुत करती हैं। कहा जाता है कि आज लिया गया कर्ज़ कल की समृद्धि का आधार बनेगा। पर सवाल यह है कि क्या हर कर्ज़ उत्पादक होता है? क्या हर उधार विकास में बदलता है, या फिर उसका बड़ा हिस्सा केवल व्यवस्था को चलाए रखने में खर्च हो जाता है? यही सवाल राज्यों के वित्त से लेकर आम आदमी की जेब तक समान रूप से लागू होता है।

चिंता का विषय यह नहीं है कि कर्ज़ लिया जा रहा है, बल्कि यह है कि कर्ज़ को सामान्य और अनिवार्य मान लिया गया है। जब सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग कर्ज़ को सहजता से स्वीकार करते हैं, तो समाज के निचले स्तर तक यही संदेश जाता है कि उधार लेकर चलना कोई असामान्य बात नहीं। धीरे-धीरे आत्मनिर्भरता की जगह किस्तों की संस्कृति ले लेती है।

लोकतंत्र में सरकारें जवाबदेह होती हैं और आर्थिक फैसलों की समीक्षा ज़रूरी है। देश और राज्यों के कर्ज़ का बोझ आखिरकार जनता पर ही आता है—करों के रूप में, महंगाई के रूप में और भविष्य की सीमाओं के रूप में। इसलिए यह बहस जरूरी है कि विकास और कर्ज़ के बीच संतुलन कहाँ है।

प्रधानमंत्री की विदेश यात्राएँ हों या राज्यों की विकास योजनाएँ—इनका मूल्यांकन केवल प्रतीकों और भाषणों से नहीं, बल्कि ठोस आर्थिक परिणामों से होना चाहिए। उसी तरह, आम आदमी के लिए भी यह ज़रूरी है कि वह सरकारों से मिले ‘आत्मविश्वास’ को आँख बंद कर न अपनाए।

कर्ज़ पर चलती अर्थव्यवस्था कुछ समय तक रफ्तार बनाए रख सकती है, लेकिन स्थायी प्रगति के लिए वित्तीय अनुशासन अपरिहार्य है। वरना एक दिन यह सवाल केवल सरकारों से नहीं, बल्कि हर नागरिक से पूछा जाएगा—
“चल तो रहा था, लेकिन किस कीमत पर?”

Wednesday, December 10, 2025

विकास बनाम पर्यावरण: क्या तपोवन की 1700 पेड़ों की बलि जरूरी है?

 विकास बनाम पर्यावरण: क्या तपोवन की 1700 पेड़ों की बलि जरूरी है?

नासिक कुंभ मेला दुनिया का सबसे बड़ा आध्यात्मिक और सांस्कृतिक आयोजन है। मिट्टी, संस्कृति और अध्यात्म की सुगंध से बना यह आयोजन स्वयं में महान है। लेकिन विडंबना यह है कि उसी आध्यात्मिक ऊर्जा के केंद्र—तपोवन—में आज 1700 से अधिक पेड़ों की कटाई का प्रस्ताव रखा गया है।

प्रश्न यह नहीं है कि कुंभ के लिए सुविधाएँ क्यों चाहिए। प्रश्न यह है कि सुविधाएँ प्रकृति की कीमत पर क्यों?
आज दुनिया सतत विकास की बात कर रही है। शहर आधुनिकता के साथ ‘ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर’ को जोड़ रहे हैं। ऐसे समय में धार्मिक आयोजन के लिए हज़ारों पेड़ काटना नासिक को पीछे ले जाने वाला कदम है।

पेड़ केवल लकड़ी नहीं—एक जीवित तंत्र है। वे हवा शुद्ध करते हैं, मिट्टी को बाँधते हैं, गर्मी कम करते हैं और मानव–जीवन के लिए सुरक्षा कवच का काम करते हैं। तपोवन जैसे हरित क्षेत्र में पेड़ों की इतनी बड़ी कटाई न केवल पर्यावरणीय नुकसान है, बल्कि सांस्कृतिक विरासत पर भी प्रहार है।

क्या विकल्प नहीं हैं?
बिल्कुल हैं। आधुनिक बायोटॉयलेट, पोर्टेबल सैनिटेशन यूनिट, मोबाइल वॉशरूम, और पर्यावरण-अनुकूल अस्थायी ढाँचे दुनिया के अनेक बड़े आयोजनों में अपनाए जा चुके हैं। यह ऐसे समाधान हैं जिनसे पेड़ों को छुए बिना आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध कराई जा सकती हैं।

समाज और प्रशासन दोनों के लिए यह समय आत्मचिंतन का है। धार्मिक आयोजन के नाम पर प्रकृति का नुकसान हमारी आस्था का उद्देश्य नहीं हो सकता।
तपोवन को बचाना केवल 1700 पेड़ों को बचाना नहीं है—यह नासिक की पहचान, संस्कृति और भविष्य को सुरक्षित रखना है।

अब नागरिकों को जिम्मेदारी के साथ अपनी आवाज़ उठानी होगी ताकि विकास और पर्यावरण एक साथ चल सकें।

Monday, December 8, 2025

कविता: शरीर और मन का अनुनाद



1️⃣ कविता: शरीर और मन का अनुनाद

सांसों की चुप रोशनी में,
मन का एक चराग जलता है।
शरीर की थकी गलियों में,
शांति का कोई पंछी पलता है।

जब धड़कनें विचारों के साथ
एक ही लय में चलती हैं,
तब भीतर का टूटा संगीत
फिर से सुर पाता है।

तन की मिट्टी और मन का आकाश,
दोनों एक ही क्षण में खुलते हैं,
और इंसान अपने भीतर छिपा
सच पहचानने लगता है।

न कोई युद्ध, न कोई शोर—
सिर्फ भीतर का धीमा कंपन।
जहाँ शरीर शांत, मन प्रसन्न,
और आत्मा गाती है—
"यही मेरा घर, यही मेरा ध्यान।"


2️⃣ संपादकीय: शरीर और मन का अनुनाद—समकालीन जीवन की गुम होती लय

हम आधुनिक दुनिया में तेज़ी से भागते हुए अक्सर भूल जाते हैं कि इंसान दो हिस्सों में बँटा हुआ नहीं है—एक शरीर और दूसरा मन। वास्तविकता यह है कि दोनों एक ही समग्र अस्तित्व के दो स्वर हैं। जब ये स्वर तालमेल में होते हैं, तभी जीवन का संगीत पूर्ण होता है; और जब इनमें दरार पड़ती है, तो हमारा पूरा अस्तित्व असंतुलन में डगमगाने लगता है।

आज का मनुष्य तनाव, भागदौड़ और अनिश्चितताओं के बीच जी रहा है। तकनीक की चमक और सूचनाओं की बाढ़ के बीच मन लगातार उत्तेजित रहता है, जबकि शरीर अनियमित जीवनशैली की मार झेलता है। परिणाम यह कि दोनों की लय टूट जाती है। यही टूटन चिंता, अनिद्रा, अवसाद और थकान के रूप में सामने आती है।

शरीर–मन अनुनाद कोई अध्यात्मिक कल्पना नहीं है; यह विज्ञान और व्यवहार दोनों की कसौटी पर खरी उतरने वाली वास्तविकता है। ध्यान, श्वास साधना और सचेत चाल-ढाल आज पूरी दुनिया में स्वास्थ्य-विज्ञान द्वारा स्वीकार की जा चुकी प्रक्रियाएँ हैं। यह प्रमाणित है कि धीमी और गहरी सांसें मस्तिष्क के तनाव केंद्रों को शांत करती हैं, और बदले में शरीर के हार्मोनल तंत्र को संतुलित करती हैं।

दूसरी ओर, शरीर की उपेक्षा सीधे मन की गुणवत्ता पर चोट करती है। खराब नींद, असंतुलित भोजन या निष्क्रियता केवल शारीरिक बीमारियाँ नहीं लातीं—वे विचारों को धुँधला, भावनाओं को चिड़चिड़ा और निर्णयों को अस्थिर बनाती हैं।

समस्या यह नहीं कि मनुष्य व्यस्त है; समस्या यह है कि वह अपनी लय से कट चुका है।
समाधान भी उतना ही सरल है—
शांत सांसें, सचेत अस्तित्व, और शरीर व मन के बीच संवाद।

आज की दुनिया को सिर्फ तेज़ गति नहीं, बल्कि सही लय की आवश्यकता है।
और यह लय तब मिलती है जब हम स्वीकार करते हैं कि शरीर और मन विरोध नहीं, बल्कि साथी हैं—एक-दूसरे की ऊर्जा को बढ़ाने वाले।

हमारे समाज, शिक्षा और कार्य-संस्कृति को भी इस समझ को अपनाने की ज़रूरत है। जीवन की गुणवत्ता केवल आर्थिक विकास से नहीं, बल्कि आंतरिक लय के संतुलन से तय होती है।

शरीर और मन के इस अनुनाद को पुनः खोज लेना, आधुनिक मनुष्य के लिए न केवल उपयोगी बल्कि आवश्यक है — क्योंकि लय में होता मनुष्य  सक्षम और शांत होता है।



Monday, December 1, 2025

राजभवन से ‘लोक भवन’ तक — नाम बदलने के पीछे की राजनीति और प्रतीकवाद

संपादकीय

राजभवन से ‘लोक भवन’ तक — नाम बदलने के पीछे की राजनीति और प्रतीकवाद

उत्तराखंड सरकार द्वारा राजभवन का नाम बदलकर ‘लोक भवन’ रखना सिर्फ एक नामांतरण नहीं है, बल्कि एक राजनीतिक बयान है—एक ऐसा बयान जो प्रतीकों की राजनीति, सत्ता की वैचारिक दिशा और लोकतांत्रिक संस्थाओं को नए सांचे में ढालने की कोशिशों को सामने लाता है।

राजभवन भारतीय संघीय लोकतंत्र में राज्यपाल की संवैधानिक भूमिका का प्रतीक रहा है। औपनिवेशिक काल से निकली इस संस्था की अपनी जड़ें और परंपराएँ हैं। लेकिन नाम में ‘राज’ शब्द को बदलकर ‘लोक’ करना उस व्यापक विमर्श का हिस्सा है जो सत्ता प्रतिष्ठानों को जनता-केंद्रित दिखाने की कोशिश में लगातार आगे बढ़ रहा है। यह बदलाव बताता है कि सत्ता जनसंपर्क और प्रतीकों के अर्थ बदलकर एक नई राजनीतिक भाषा निर्मित करना चाहती है।

सवाल यह नहीं कि नाम ‘लोक भवन’ अच्छा है या बुरा; सवाल यह है कि क्या नाम बदलने भर से संस्थाओं का लोकतांत्रिक चरित्र मजबूत हो जाता है? राज्यपाल की भूमिका, केंद्र-राज्य संबंधों की जटिलताएँ, और संविधान की मर्यादा—ये सब मुद्दे जस के तस बने हुए हैं। नाम बदलने से न तो संवैधानिक जवाबदेही बढ़ती है, न ही संस्थागत पारदर्शिता अपने आप स्थापित होती है।

उत्तराखंड जैसे राज्य में, जहाँ शासन संरचनाएँ अब भी विकास, पारदर्शिता और जवाबदेही की चुनौतियों से जूझ रही हैं, नाम परिवर्तन को प्राथमिकता देना यह दर्शाता है कि सरकार रूपक और प्रतीकवाद को वास्तविक काम पर तरजीह दे रही है। यह बदलाव ज़्यादा प्रभावी होता अगर इसके साथ राज्यपाल कार्यालय की कार्यप्रणाली में सुधार, जनता से संचार को मजबूत करने, और संविधानिक प्रक्रियाओं में पारदर्शिता जैसे कदम भी जुड़े होते।

‘लोक भवन’ नामकरण एक सकारात्मक संकेत हो सकता है—अगर इसके साथ प्रशासनिक संस्कृति भी ‘लोक’ यानी जनता की ओर उन्मुख हो। लेकिन अगर यह सिर्फ राजनीतिक ब्रांडिंग का हिस्सा बनकर रह गया, तो यह भी अन्य नामांतरणों की तरह केवल शोर पैदा करेगा, परिवर्तन नहीं।

लोकतंत्र में प्रतीक मायने रखते हैं, लेकिन प्रतीकों से पहले ज़रूरत है संस्थाओं को मजबूत करने की। राजभवन चाहे ‘राज’ कहलाए या ‘लोक’, उसकी भूमिका तभी सार्थक होगी जब वह संविधान की आत्मा, जनहित और निष्पक्षता के मूल्यों को निभाए।

Sunday, November 23, 2025

काले मुर्गे की बढ़ती मांग: अंधविश्वास की वापसी या बेरोज़गारी का नया बाजार?

संपादकीय

काले मुर्गे की बढ़ती मांग: अंधविश्वास की वापसी या बेरोज़गारी का नया बाजार?

उत्तराखंड एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है जहाँ आस्था और अंधविश्वास, विज्ञान और तंत्रवाद, और रोजगार व बाज़ार—तीनों की टकराहट साफ देखी जा सकती है। हाल के दिनों में मषण पूजन, झाड़–फूंक और तांत्रिक अनुष्ठानों की बढ़ती चर्चा के साथ काले मुर्गों की मांग में अचानक उछाल आना कोई संयोग नहीं है।

पहाड़ के कई इलाकों में काले मुर्गे बाजार में आमतौर पर मिलने वाली कीमत से कई गुना अधिक दामों पर बेचे जा रहे हैं। इसकी वजह न वैज्ञानिक है, न आर्थिक—बल्कि समाज में फैलती वह मनोवृत्ति है जहाँ समाधान की तलाश तर्क में नहीं बल्कि डर और आस्था में की जा रही है।

अंधविश्वास का बाज़ार

उत्तराखंड की पहाड़ी बसावटें सदियों से अपने लोकदेवताओं, रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक परंपराओं के लिए जानी जाती रही हैं। यह परंपराएँ समाज को जोड़ने का काम करती थीं। लेकिन अब इन्हीं परंपराओं की आड़ में एक ऐसा अंधविश्वास पनप रहा है जो न सिर्फ लोगों को भ्रमित कर रहा है, बल्कि उसे एक ‘कमाई का साधन’ भी बनाया जा रहा है।

कुछ लोगों द्वारा प्रचारित यह धारणा कि काले मुर्गे से “उपरी बाधा”, “बुरी नजर” या “ग्रह दोष” दूर हो सकते हैं, न सिर्फ वैज्ञानिक दृष्टि का क्षय है बल्कि लोगों की कमजोरियों का शोषण भी है।

दुर्भाग्य यह है कि यही अंधविश्वास अब व्यापार बन गया है।

बेरोज़गारी और भ्रमित विकल्प

राज्य में बेरोज़गारी एक बड़ी चुनौती है। ऐसे में युवा किसी भी नए रोज़गार मॉडल की तरफ आकर्षित होते हैं। मुर्गी पालन एक बेहतर और व्यावहारिक व्यवसाय हो सकता है, लेकिन जब उसका आधार अंधविश्वास बन जाए तो समाज के सामने नई समस्याएँ खड़ी होती हैं।

यह सवाल महत्वपूर्ण है कि क्या उत्तराखंड के युवाओं का भविष्य ऐसे व्यवसाय पर टिक सकता है जो तर्कहीन मान्यताओं पर आधारित हो?
अगर रोजगार की दिशा अज्ञान, डर, और तांत्रिक प्रथाओं पर निर्भर होने लगे, तो यह प्रगति नहीं, पिछड़ापन है।

क्या हम पुराने दौर की ओर लौट रहे हैं?

गाँवों में बढ़ती झाड़–फूंक संस्कृति, बीमारी का इलाज मेडिकल सेंटर की बजाय अनुष्ठान से करवाना, और सामाजिक संकटों का हल तांत्रिक तरीकों में ढूँढ़ना—ये सब संकेत हैं कि हम वैज्ञानिक सोच से दूर होते जा रहे हैं।
यह वही रास्ता है जो समाज को विकास से नहीं, बल्कि भ्रम की खाई में ले जाता है।

उत्तराखंड जैसे संवेदनशील और आपदाग्रस्त राज्य में वैज्ञानिक चेतना न सिर्फ ज़रूरी है बल्कि जीवनरक्षक भी है। ऐसे में अंधविश्वास का बढ़ना एक खतरनाक संदेश देता है।

आगे की दिशा

समाधान सरकार या समाज—दोनों की सामूहिक जिम्मेदारी है।

स्कूलों और गांवों में वैज्ञानिक चेतना के कार्यक्रम

स्वास्थ्य सुविधाओं और मानसिक परामर्श तक आसान पहुंच

प्रशासन द्वारा अवैध तांत्रिक गतिविधियों पर रोक

आधुनिक पशुपालन और वैज्ञानिक खेती को बढ़ावा

मीडिया द्वारा संतुलित, तथ्यपूर्ण रिपोर्टिंग


यह जरूरी है कि हम रोजगार दें—लेकिन ऐसा रोजगार जो तर्क, तकनीक, और सृजनशीलता पर आधारित हो, न कि भय और अंधविश्वास पर।



काला मुर्गा समस्या नहीं है—वह केवल एक प्रतीक है।
समस्या वह सोच है जो आज भी हमारे समाज के बड़े हिस्से को जकड़े हुए है।

उत्तराखंड को आगे बढ़ना है तो रास्ता विज्ञान से होकर गुजरेगा, न कि उन काले मुर्गों से जिनकी कीमत आज आस्था के नाम पर लगातार बढ़ रही है।

Saturday, November 22, 2025

**Journalism in the Age of Labor Codes: A New Chapter of Rights or the End of Old Protections?**


**Journalism in the Age of Labor Codes: A New Chapter of Rights or the End of Old Protections?**


The implementation of four labor codes by the central government has marked a decisive shift in the country's labor landscape. These codes formally abolished 29 outdated labor laws. In the same vein, three important laws related to journalists and the press industry—the *Working Journalists Act*, the *Working Journalists' Wages Act*, and the *Trade Unions Act*—have also become part of history.


This change is not merely a matter of renaming laws or consolidating them into a single folder; it marks a turning point in the structure of rights, protections, and professional dignity in Indian journalism.


### **Broader Definition—A Positive Step**


Amending the Working Journalists Act and incorporating it into an industry-specific code is a welcome step in that the definition of a journalist has become more contemporary.


Today, the largest segment of media is electronic, digital, and audio-visual platforms, employing millions—yet, surprisingly, these journalists did not receive the same protections as print journalists under the old law.


The new definition eliminates this disparity and acknowledges the changing reality of media.


### **But concerns are not without**


While this change is in keeping with modernity, a major debate has been suppressed in the process—

**Will the special protections afforded to journalists now be weakened?**


The old laws provided journalists with a distinct identity, distinct rights, and a unique protection framework. The wage board system, limitations on disciplinary action, special protections against arbitrary dismissal, and a specific interpretation of employer-employee relations—all these distinguished journalism from a general industry.


The new Code now includes journalists within the broader scope of general industries. This threatens to upset the balance between industry interests and editorial autonomy.


### **Potential Impact on Press Freedom**


When journalists' rights are weakened, press freedom ultimately suffers. Journalists working in an insecure, unstable, and uncertain environment often hesitate to report boldly against powerful forces, corporate pressure, or organizational interests.


Therefore, the question isn't just about employment; it's about strengthening the fourth pillar of democracy.


### **Responsibility of both the government and the media**


The responsibility doesn't end with the implementation of labor codes. The real test will now be:

to what extent the rules established under the codes protect the actual rights and protections of journalists.


Media owners also have a moral obligation to use the technical reforms in the law not to weaken journalists' protections, but to make media houses more transparent and accountable.


### **Finally…**


The four labor codes are an attempt to simplify and streamline India's industrial structure. But journalism isn't just an industry—it's the heartbeat of democracy.

The new codes certainly provide a modern framework, but this framework will only be meaningful if journalists' rights are protected, their voices are safeguarded, and the press remains the watchdog of the people, not of power.


This is a time of both excitement and concern.


This is a time to be vigilant.

Thursday, November 20, 2025

प्रारंभिक बचपन में समय पर पहचान और हस्तक्षेप से बदलेगा बच्चों का भविष्य: Udaen Foundation



Udaen Foundation
दिनांक: 21/11/2025
स्थान: 


Udaen Foundation ने कहा है कि जन्म से छह वर्ष तक की आयु बच्चों के मस्तिष्क विकास का सबसे संवेदनशील और तेज़ चरण होता है। इस अवधि में समय पर की गई जांच, मूल्यांकन और सही हस्तक्षेप बच्चों के जीवन में दीर्घकालिक सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं।

फाउंडेशन के अध्यक्ष दीनेश पाल सिंह गुसाईं ने बताया कि प्रारंभिक जांच न केवल दिव्यांगता के शुरुआती संकेतों की पहचान सुनिश्चित करती है, बल्कि विकास में देरी वाले बच्चों को सही दिशा और सुविधाएँ उपलब्ध कराने में भी महत्वपूर्ण है। इससे परिवारों को सही मार्गदर्शन मिलता है और वे सरकारी योजनाओं एवं संस्थागत सेवाओं का लाभ आसानी से ले सकते हैं।

उन्होंने कहा कि प्रारंभिक हस्तक्षेप से बच्चों में भाषा, संज्ञानात्मक क्षमता, मोटर स्किल और सामाजिक-भावनात्मक कौशल जैसे आवश्यक विकासात्मक गुण अधिक प्रभावी ढंग से विकसित होते हैं। यह उन्हें स्कूल और समाज में बेहतर भागीदारी के लिए तैयार करता है।

Udaen Foundation ने राष्ट्रीय स्तर पर दिव्यांगजन सशक्तिकरण के क्षेत्र में कार्य कर रहे प्रमुख संस्थानों—
DDU-NIPPD, NIEPID, SVNIRTAR कट्टक, NIEPVD, AYJNISHD, अटल बिहारी वाजपेयी दिव्यांगजन खेल प्रशिक्षण केंद्र, CRC लखनऊ और CRC गोरखपुर—की सेवाओं की सराहना की। फाउंडेशन ने कहा कि ये संस्थान देशभर में बच्चों की प्रारंभिक पहचान, थेरेपी, पुनर्वास और परामर्श सेवाओं के माध्यम से महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।

अध्यक्ष दीनेश पाल सिंह गुसाईं ने कहा कि “यदि समाज, संस्थान और परिवार मिलकर कार्य करें, तो प्रारंभिक बचपन से ही दिव्यांग बच्चों के जीवन को सशक्त बनाने की दिशा में बड़ा बदलाव संभव है। हमारा लक्ष्य है—सशक्त दिव्यांगजन, समर्थ भारत।”

मीडिया संपर्क

दिनेश पाल सिंह गुसाईं 
अध्यक्ष, Udaen Foundation
मोबाइल: 6395501520
ईमेल: udaenhimalya@gmail.com

“सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स और दिव्यांगजन समावेशन: भविष्य का भारत किस दिशा में?”— दीनेश पाल सिंह गुसाईँ


दिव्यांगजन समावेशन पर राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर संवाद की आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जा रही थी। 12वीं राष्ट्रीय दिव्यांगता सम्मेलन ने इस दिशा में एक मजबूत पहल करते हुए “सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स (SDGs) और दिव्यांगजन समावेशन” जैसे व्यापक विषय पर केंद्रित चर्चा की, जिसने न केवल चुनौतियों को उजागर किया बल्कि एक सशक्त भविष्य की रूपरेखा भी प्रस्तुत की।

भारत ने SDGs के माध्यम से यह संकल्प लिया है कि विकास की दौड़ में किसी को पीछे नहीं छोड़ा जाएगा। लेकिन वास्तविकता यह बताती है कि स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और तकनीक तक दिव्यांगजनों की समान पहुँच अभी भी एक दूर का लक्ष्य है। सम्मेलन में प्रस्तुत आँकड़े—70% पुनर्वास विशेषज्ञों की कमी, 50% विशेष शिक्षकों का अभाव और पूरे देश में 60 से भी कम एक्सेसिबिलिटी ऑडिटर्स—इस बात का संकेत हैं कि समावेशन अब विकल्प नहीं बल्कि विकास की अनिवार्यता है।

तकनीक और स्किलिंग पर केंद्रित सत्रों ने यह भरोसा दिलाया कि AI, डिजिटल टूल्स और सहायक तकनीक दिव्यांगजनों के लिए नए अवसरों के द्वार खोल सकते हैं। राष्ट्रीय एबिलिम्पिक्स के प्रतिभागियों की प्रतिभा और जज़्बे ने यह साबित किया कि कौशल की दुनिया में कोई सीमा नहीं—सीमाएँ केवल उन नजरियों में होती हैं जो समाज अक्सर दिव्यांगजनों पर थोप देता है।

सम्मेलन में “Sarthak Global University” का विचार एक दूरदर्शी कदम के रूप में उभर कर आया। यदि भारत को दिव्यांगता अध्ययन, शोध, पुनर्वास और समावेशी शिक्षा के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व हासिल करना है, तो ऐसी संस्था की स्थापना समय की बड़ी मांग है।

मीडिया की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। जब तक समाज के कथानक बदलेंगे नहीं, तब तक नीतियाँ और कार्यक्रम भी आधे-अधूरे रहेंगे। दिव्यांगजनों के संघर्ष, उपलब्धियों और क्षमताओं को सम्मानजनक तरीके से प्रस्तुत करना मीडिया की जिम्मेदारी है, ताकि समाज में सकारात्मक और संवेदनशील दृष्टिकोण पैदा हो सके।

अंततः, यह सम्मेलन हमें एक स्पष्ट संदेश देता है—
दिव्यांगजन भारत के विकास के केंद्र में हैं, हाशिये पर नहीं।
SDGs हमें वह रूपरेखा देते हैं जो एक समावेशी, न्यायपूर्ण और सुलभ समाज के निर्माण की दिशा में हमारा मार्गदर्शन करती है। अब आवश्यक है कि सरकार, कॉर्पोरेट, सामाजिक संस्थाएँ और नागरिक समाज मिलकर एक ऐसे भारत का निर्माण करें जहाँ हर व्यक्ति—क्षमता या अक्षमता से परे—सम्मान, अधिकार और अवसरों के साथ आगे बढ़ सके।

12वीं राष्ट्रीय दिव्यांगता सम्मेलन ने इस यात्रा को एक नई दिशा दी है।
अब यह हम पर निर्भर है कि हम इस दिशा को कितनी दूर और कितनी दृढ़ता से लेकर जाते हैं।

दीनेश पाल सिंह गुसाईँ

🇮🇳 e₹ (Digital Rupee) क्या है?



🇮🇳 e₹ (Digital Rupee) क्या है?

e₹ भारत का CBDC (Central Bank Digital Currency) है, जिसे भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) जारी करता है।
यह नकद (Cash) का ही डिजिटल रूप है — नोट और सिक्कों जैसी ही वैध मुद्रा, बस मोबाइल वॉलेट में डिजिटल रूप में।


🔵 e₹ के दो प्रकार

RBI ने e-rupee के दो संस्करण जारी किए हैं:

1️⃣ Retail e₹ (e₹-R) – आम जनता के लिए

  • मोबाइल वॉलेट में रखा जाता है

  • QR code से भुगतान

  • दुकान, बाजार, ऑनलाइन सभी जगह उपयोग योग्य

  • ठीक UPI की तरह, लेकिन यह पैसा बैंक में नहीं, सीधे RBI से आता है

2️⃣ Wholesale e₹ (e₹-W) – बैंक/संस्थाओं के लिए

  • बड़े लेन-देन, सरकारी बॉन्ड, इंटरबैंक ट्रांसफर में उपयोग

  • जनता के लिए नहीं


🔧 e₹ कैसे काम करता है?

  • RBI डिजिटल रुपए जारी करता है

  • बैंक इसका वितरण करते हैं

  • उपयोगकर्ता अपने मोबाइल में e₹ Wallet रखते हैं

  • Payment UPI जैसा दिखता है, लेकिन ये बैंक बैलेंस नहीं, RBI का डिजिटल कैश होता है

इसलिए e₹ एक Legal Tender है, जिसे हर कोई स्वीकार करेगा।


e₹ (Digital Rupee) के फायदे

1. Cash का डिजिटल और सुरक्षित रूप

नोट खोने, फटने, पुराना होने का डर नहीं।
यह 24x7 सुरक्षित रहता है और नकली नहीं बनाया जा सकता।

2. तेज Digital Payments बिना बैंक निर्भरता

UPI में बैंक सर्वर डाउन हुआ तो पेमेंट रुक जाती है।
लेकिन e₹ सीधे RBI-सपोर्टेड है, इसलिए बैंक फेलियर पे भी भुगतान रुकता नहीं।

3. सस्ता और तुरंत भुगतान

ट्रांजैक्शन फीस शून्य या लगभग शून्य।
तेज गति—सेकंडों में लेनदेन पूरा।

4. गोपनीयता (अन्य डिजिटल भुगतान से बेहतर)

e₹ में UPI की तरह हर ट्रांजैक्शन बैंक स्टेटमेंट में नहीं लिखता।
छोटे कैश-जैसे लेनदेन काफी हद तक निजी (privacy-friendly) बनाए जा रहे हैं।

5. नकदी प्रबंधन में भारी बचत

सरकार को नोट छापने, ढोने, गिनने पर करोड़ों खर्च होते हैं।
e₹ से यह खर्च कम होगा।

6. भ्रष्टाचार/नकली नोट पर रोक

न तो नकली बनाया जा सकता है
न ही बिना रिकॉर्ड के अवैध रूप से करोड़ों का लेनदेन किया जा सकता है।

7. अंतरराष्ट्रीय भुगतान आसान होंगे

भविष्य में जब देशों के बीच CBDC-सिस्टम जुड़ेंगे तो
तुरंत, सस्ता, और बिना SWIFT के पैसे भेजे जा सकेंगे।


e₹ के नुकसान और चुनौतियाँ

1. गोपनीयता को लेकर चिंता

हालाँकि कैश जैसा बनाने की कोशिश है,
लेकिन सरकार/सिस्टम कितनी जानकारी रखेगा—यह बहस का मुद्दा है।

2. टेक्नोलॉजी पर निर्भरता

बिना स्मार्टफोन व इंटरनेट e₹ उपयोग कठिन।
गाँव, बुजुर्ग, तकनीकी रूप से कमजोर वर्ग को दिक्कतें हो सकती हैं।

3. बैंकिंग सिस्टम पर असर

अगर लोग बड़ी मात्रा में बैंक बैलेंस निकालकर e₹ वॉलेट में रखेंगे तो:

  • बैंकों के पास लोन देने के लिए पैसा कम हो सकता है

  • बैंकिंग सिस्टम को नया दबाव झेलना पड़ सकता है

4. साइबर सुरक्षा के खतरे

हालांकि RBI सिस्टम सुरक्षित है, फिर भी:

  • फ़िशिंग

  • वॉलेट हैक

  • फ़र्ज़ी ऐप

जैसे जोखिम बने रहेंगे।


e₹ और UPI में क्या अंतर है?

तुलना UPI e₹ (Digital Rupee)
पैसा कहाँ रहता है? बैंक में RBI के डिजिटल कैश के रूप में
ट्रांसफर कैसा? बैंक से बैंक वॉलेट से वॉलेट (कैश-जैसा)
बैंक सर्वर डाउन? पेमेंट रुक सकता है पेमेंट चलता रहेगा
गोपनीयता कम अधिक (कैश जैसा बनाने की कोशिश)
शुल्क आमतौर पर फ्री फ्री/बहुत कम

🔮 Digital Rupee का भविष्य (भारत में)

  • रेलवे, पेट्रोल पंप, टोल, सरकारी भुगतान E₹ से होंगे

  • अंतरराष्ट्रीय CBDC नेटवर्क जुड़ेगा

  • बड़े स्तर पर कैश की जगह e₹ ले सकेगा

  • सरकारी सब्सिडी सीधे डिजिटल रुपए में भेजी जा सकेगी

  • Tax-compliance और कालेधन पर रोक लगेगी



e₹: भारत की डिजिटल मुद्रा– अर्थव्यवस्था के नए युग की शुरुआत


📰 संपादकीय / लेख

e₹: भारत की डिजिटल मुद्रा– अर्थव्यवस्था के नए युग की शुरुआत

भारत तेज़ी से डिजिटल अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है e₹ – डिजिटल रुपया, जिसे भारतीय रिज़र्व बैंक ने 2022–23 से चरणबद्ध तरीके से लागू किया। e₹ को सामान्य भाषा में समझें तो यह रुपये का डिजिटल संस्करण है, जिसे RBI सीधे जारी करता है। यह नोट और सिक्कों जैसा ही “कानूनी मुद्रा” है—बस डिजिटल रूप में।


🔵 e₹ क्या है और कैसे काम करता है?

e₹ को केंद्रीय बैंक अपने नियंत्रण में जारी करता है और नागरिक इसे अपने e₹ वॉलेट में रखते हैं। यह वॉलेट UPI जैसा होता है, लेकिन एक बड़ा अंतर है—
UPI बैंक खाते से linked होता है, जबकि e₹ सीधे RBI की करेंसी है।
यानी यह “डिजिटल कैश” है, जिसे कोई भी स्वीकार करने से मना नहीं कर सकता।


🟢 e₹ के प्रमुख फायदे

1. तेज़, सुरक्षित और कैश-जैसा भुगतान

e₹ में लेनदेन तुरंत होता है और नकदी के मुकाबले अधिक सुरक्षित है। चोरी, नकली नोट या नुकसान का खतरा नहीं रहता।

2. बैंक सर्वर डाउन होने पर भी काम करेगा

UPI का भुगतान बैंक पर निर्भर है, लेकिन e₹ वॉलेट-to-वॉलेट चलता है।
इससे भुगतान में रुकावटें कम होंगी।

3. भ्रष्टाचार, हवाला और नकली नोटों पर रोक

क्योंकि मुद्रा डिजिटल है, इसे नकली नहीं बनाया जा सकता।
अनधिकृत बड़े लेनदेन को ट्रैक करना आसान होगा।

4. सरकार को भारी आर्थिक लाभ

नोट छापना, ढोना और सुरक्षित रखना—इन पर हर साल अरबों रुपये खर्च होते हैं।
डिजिटल मुद्रा से यह खर्च काफी घटेगा।

5. अंतरराष्ट्रीय भुगतान आसान होंगे

CBDC नेटवर्कों के जुड़ने पर भारत से अन्य देशों में पैसा भेजना सेकंडों में संभव होगा—SWIFT जैसी महंगी प्रणाली की ज़रूरत नहीं।


🔴 e₹ से जुड़े संभावित नुकसान/चुनौतियाँ

1. गोपनीयता पर सवाल

लोगों की चिंता है कि डिजिटल लेनदेन से उनका खर्च सरकार द्वारा देखा जा सकता है।
हालाँकि RBI छोटे लेनदेन को “कैश-जैसा प्राइवेट” बनाने पर काम कर रहा है।

2. तकनीक पर अत्यधिक निर्भरता

स्मार्टफोन, इंटरनेट और डिजिटल साक्षरता के बिना e₹ का उपयोग मुश्किल है—ग्रामीण और बुजुर्ग वर्ग को कठिनाई हो सकती है।

3. बैंकिंग सिस्टम पर दबाव

यदि लोग बड़ी मात्रा में पैसा बैंक से निकालकर e₹ में रखेंगे,
तो बैंक की जमा राशि (Deposits) कम हो सकती है, जिससे Loans पर असर पड़ सकता है।

4. साइबर जोखिम

हालाँकि RBI का सिस्टम अत्यंत सुरक्षित है परंतु
नकली ऐप, फ़िशिंग और धोखाधड़ी जैसी चुनौतियाँ बनी रहेंगी।


🟣 e₹ और UPI में मूल अंतर

आधार UPI e₹ (Digital Rupee)
पैसा कहाँ रखा है? बैंक खाते में सीधे RBI के डिजिटल वॉलेट में
लेन-देन बैंक–to–बैंक वॉलेट–to–वॉलेट (कैश जैसा)
सर्वर डाउन पेमेंट रुक सकता है पेमेंट जारी रहेगा
गोपनीयता कम अधिक, कैश जैसा

🟡 भारत में e₹ का भविष्य

  • सरकारी सब्सिडी e₹ में भेजी जा सकती है

  • रेलवे, टोल, बस सेवा, पेट्रोल पंप पर e₹ भुगतान

  • सीमा पार (cross-border) CBDC पेमेंट

  • कैश-कम अर्थव्यवस्था और टैक्स अनुपालन में सुधार

  • डिजिटल इंडिया को नई दिशा

भारत के लिए e₹ सिर्फ एक डिजिटल प्रयोग नहीं, बल्कि आर्थिक आत्मनिर्भरता की नयी पहचान बन सकता है।


Saturday, November 15, 2025

लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ और हकीकत: उत्तराखंड के पत्रकारों की चमक के पीछे छुपी सच्चाई

संपादकीय
लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ और हकीकत: उत्तराखंड के पत्रकारों की चमक के पीछे छुपी सच्चाई

उत्तराखंड में पत्रकारिता की चकाचौंध जितनी सुर्खियों में दिखती है, उसके पीछे की हकीकत उतनी ही धुंधली और दर्दनाक है। लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहलाने वाला मीडिया आज खुद अपनी जड़ों में दरारें लिए खड़ा है—दरारें, जो मजदूरी पर टिकी पत्रकारिता, ठेकेदारी व्यवस्था और मालिकों की मनमानी ने पैदा की हैं।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने जब ब्लॉक और तहसील स्तर पर पत्रकारों को मान्यता देने की घोषणा की, तो इसे एक बड़ा कदम माना गया। यह निर्णय इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि समय-समय पर इलाज के अभाव में पत्रकारों की मौत और परिवारों की बदहाली ने एक ऐसी सच्चाई उजागर की जिसे मीडिया घराने हमेशा दबाते आए—कि रिपोर्टर चमक दिखाते हैं, लेकिन उनकी ज़िंदगी अंधेरे में डूबी रहती है।

सरकारी विज्ञापनों के करोड़ों रुपये जब मीडिया मालिकों की तिजोरियों में पहुंचते हैं, तब भी रिपोर्टिंग की रीढ़ माने जाने वाले पत्रकार मामूली वेतन के लिए भी तरसते रहते हैं। और जब सरकार ने पहली बार यह पूछना चाहा कि “राज्य में पत्रकार आखिर कौन हैं?”, तब सबसे बड़ा पर्दाफाश हुआ—जिन्हें हम अखबार का रिपोर्टर और टीवी चैनल का संवाददाता समझते हैं, मालिक कह रहे हैं कि हम उन्हें जानते तक नहीं।

यह स्थिति सिर्फ उत्तराखंड के मीडिया की नहीं, बल्कि लोकतंत्र की भी हार है।
जिस व्यक्ति की बाइलाइन रोज अखबार में छपती है, वह असल में किसी ठेकेदार की ‘लेबर’ निकला।
जिसके पास राज्य की घटनाओं की खबरें लाने का जिम्मा है, उसके पास पहचान-पत्र तक नहीं।
यह सिर्फ व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि मीडिया मालिकों का ऐसा तंत्र है जिसमें रिपोर्टर केवल उपयोग की चीज़ है—उसे न अधिकार मिलता है, न सुरक्षा, न सम्मान।

और सच यह है कि जो खुद असुरक्षित हो, वह सत्ता की असलियत कैसे उजागर करेगा?
जो अपने हक पर नहीं बोल सकता, वह जनता के हक के लिए कैसे लड़ पाएगा?

उत्तराखंड में पत्रकारों की विडंबना यह है कि वे समाज की हर समस्या पर आवाज उठाते हैं, लेकिन अपने लिए मजीठिया वेज बोर्ड की व्यवस्था भी लागू नहीं करवा सके।
ढांचे बिखरे हुए हैं, संगठन कमजोर हैं, पत्रकार गुटों और कबीलों में बंट गए हैं—और इस बिखराव ने मीडिया मालिकों को अपार शक्ति दे दी है।

दूसरी ओर, सत्ता से सवाल पूछने का साहस पहले जैसा नहीं रह गया है।
सोशल मीडिया पर थोड़ा सा लिख देने से भी मुकदमे, धमकियां और चार्जशीटें तैयार हो जाती हैं।
जब आलोचना देशद्रोह बन जाए, तब लोकतंत्र संवाद नहीं, डर पर टिक जाता है।

आज जब चौथा स्तम्भ डगमगा रहा है, तब उसका उपचार जरूरी है—
सिर्फ पत्रकारों की भलाई के लिए नहीं,
बल्कि लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए।

समाधान स्पष्ट हैं:

  • पत्रकारों की अनिवार्य पहचान और वैधानिक नियुक्ति
  • मजीठिया वेज बोर्ड का सख्त पालन
  • सरकारी विज्ञापनों में पारदर्शिता
  • पत्रकारों के लिए स्वास्थ्य, बीमा और सुरक्षा कवच
  • और सबसे महत्वपूर्ण, स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता की गारंटी

यदि हम पत्रकारों को मजबूत नहीं करेंगे,
तो हम लोकतंत्र की उस नींव को ही कमजोर कर देंगे,
जिस पर समूची व्यवस्था टिकी है।

आज प्रश्न यह नहीं कि उत्तराखंड में पत्रकारों की स्थिति कैसी है।
आज वास्तविक प्रश्न यह है कि —
क्या हम ऐसा लोकतंत्र चाहते हैं, जहां खबरें बिकें, लेकिन पत्रकार भूखे मरें?

सिस्टम को जवाब देना होगा।
और जवाब अभी चाहिए—क्योंकि चुप्पी अब विकल्प नहीं है।

Friday, November 14, 2025

जेब भरी, पेट खाली — आधुनिक जीवन का नया विरोधाभास



हमारी अर्थव्यवस्था तेजी से बदल रही है। लोग पहले से अधिक कमाने लगे हैं, सुविधाएँ बढ़ रही हैं, तकनीक जीवन को आसान बना रही है। लेकिन इस चमकदार तस्वीर के पीछे एक गहरी और असहज सच्चाई छिपी है—आर्थिक रूप से सक्षम होने के बावजूद लोग भूखे पेट दिन काट रहे हैं।
यह गरीबी का नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक असंतुलन का संकट है, जिसे हम अब तक समझने में नाकाम रहे हैं।

भूख का गायब होना—मन की बीमारी, जेब की नहीं

आज कई लोग काम के बोझ, तनाव और लगातार भागदौड़ में इतने खो जाते हैं कि उन्हें खाना खाने की याद तक नहीं रहती। यह वह दौर है जहाँ शरीर की भूख से पहले मन की भूख आवाज़ देती है—और अक्सर अनसुनी रह जाती है।
मानसिक थकान, अवसाद और भावनात्मक खालीपन ने भूख को दबा दिया है। पैसा होने पर भी इंसान अपनी बुनियादी जरूरतें पूरी नहीं कर पा रहा, यह आधुनिक समाज का सबसे बड़ा विरोधाभास है।

अकेलापन—भूख का सबसे बड़ा शत्रु

शहरों में बढ़ता अकेलापन, टूटते सामाजिक संबंध और परिवारों की बदलती संरचना ने खाने के अर्थ को बदल दिया है।
कई लोग साथ के अभाव में खाना टाल देते हैं।
कभी खाना एक सामाजिक क्रिया था—अब एक व्यक्तिगत काम बनकर रह गया है।
और व्यक्तिगत काम अक्सर जिम्मेदारियों के बोझ तले दब जाते हैं।

जिम्मेदारियों की दौड़ में खुद को भूला हुआ इंसान

आर्थिक सक्षम व्यक्ति के पास साधन तो होते हैं, पर समय नहीं। पैसा कमाने की मशीन बनते-बनते मनुष्य अपने शरीर की भाषा सुनना भूल गया है।
वह दूसरों को खिलाने में लगा रहता है, पर खुद को ही भूखा छोड़ देता है।
इस देश की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि खुद पर निवेश करने की संस्कृति गायब हो रही है।

खाना नहीं, संतुलन चाहिए

यह समझना होगा कि भूख का मिटना सिर्फ खाने से नहीं, बल्कि मानसिक शांति, भावनात्मक सहारा और सामाजिक जुड़ाव से भी जुड़ा है।
जब मन थक जाता है, तो शरीर के संकेत भी धुंधले पड़ जाते हैं।
इसलिए यह मुद्दा व्यक्तिगत स्वास्थ्य से आगे बढ़कर एक सामाजिक चेतावनी है—कि हमारा जीवन संतुलन खो रहा है।

समस्या पेट की नहीं, युग की है

आधुनिक जीवन की रफ्तार ने इंसान को इतना व्यस्त और थका दिया है कि वह अपनी ही जरूरतों का बंधक बन गया है।
पैसा पाना आसान हुआ है, पर मन को स्थिर रखना कठिन।
इसलिए आज यह सवाल महत्वपूर्ण हो गया है:
क्या हम सचमुच आगे बढ़ रहे हैं, या बस भाग रहे हैं?


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निष्कर्ष:

जब जेब भरी हो पर पेट खाली, तो यह सिर्फ एक व्यक्तिगत आदत नहीं, बल्कि समाज के मानसिक स्वास्थ्य की खामोश गवाही है।
यह संकेत है कि हमें वापस खुद तक लौटना होगा—
अपने मन की सुननी होगी, अपने शरीर का सम्मान करना होगा,
और यह स्वीकार करना होगा कि जीवन केवल कमाई और काम का नाम नहीं, बल्कि देखभाल, संतुलन और आत्म-संवाद का भी नाम है।


Thursday, November 6, 2025

क्या राजनीति साधन नहीं, उद्देश्य बन गई है?



क्या राजनीति साधन नहीं, उद्देश्य बन गई है?

राजनीति का मूल अर्थ है — “जनसेवा के माध्यम से समाज में व्यवस्था, न्याय और विकास स्थापित करना।”
महात्मा गांधी ने कहा था — “राजनीति धर्म से अलग नहीं हो सकती, यदि वह समाज की सेवा के लिए की जाए।”
लेकिन आज की राजनीति को देखकर लगता है कि उसका मार्ग बदल गया है। जो कभी साधन था — अब वही उद्देश्य बन बैठा है।

1. राजनीति का उद्देश्य हुआ करता था ‘सेवा’

आज़ादी के पहले के नेताओं के लिए राजनीति एक त्याग और सेवा का मार्ग थी।
नेहरू, पटेल, अंबेडकर, लोहिया या जयप्रकाश नारायण — इन सबके लिए राजनीति का अर्थ सत्ता नहीं, समाज था।
वे जानते थे कि सत्ता साधन है — जनता की पीड़ा को कम करने, देश को दिशा देने के लिए।
लेकिन अब राजनीति का मतलब है सत्ता प्राप्ति — और सेवा, नीति, आदर्श सब पीछे छूट गए हैं।

2. सत्ता साधन से उद्देश्य कैसे बनी?

धीरे-धीरे राजनीति में विचारधारा की जगह व्यक्तिवाद, जनहित की जगह निजी स्वार्थ और संघर्ष की जगह सुविधा आ गई।
जब राजनीति में पैसा, जाति, धर्म और मीडिया की ताकत हावी होने लगी, तब नीति की जगह अवसरवाद ने ले ली।
अब नेता यह नहीं सोचते कि “मैं क्या बदल सकता हूँ”, बल्कि यह सोचते हैं कि “मुझे क्या मिलेगा?”
यही वह मोड़ है जहाँ राजनीति साधन से उद्देश्य बन गई।

3. समाज पर प्रभाव — मूल्यहीन राजनीति का दौर

जब राजनीति का उद्देश्य केवल सत्ता रह जाए, तो समाज में भी मूल्यों का पतन होता है।
जनता नेताओं को “सेवक” नहीं, “शासक” समझने लगती है।
राजनीति फिर लोकतंत्र की आत्मा नहीं, लोभ का खेल बन जाती है।
नीतियां जनहित में नहीं, बल्कि राजनीतिक हित में बनती हैं।

4. क्या अब भी बदलाव संभव है?

हाँ, बिल्कुल। राजनीति को फिर से साधन बनाने के लिए जरूरी है कि —

जनता सजग और जागरूक बने,

युवाओं को राजनीति में सेवा भावना के साथ लाया जाए,

दलों में आंतरिक लोकतंत्र और जवाबदेही स्थापित की जाए,

और सबसे जरूरी — जनता यह पूछे कि “राजनीति से हमें क्या मिला?” नहीं, बल्कि “राजनीति ने समाज के लिए क्या किया?”


5. निष्कर्ष

राजनीति जब तक साधन है, तब तक वह लोकशक्ति है;
पर जब वह उद्देश्य बन जाती है, तब वह लोकशक्ति नहीं, लोभशक्ति बन जाती है।
अब समय है कि राजनीति को फिर से अपने मूल स्वरूप — जनसेवा और सामाजिक परिवर्तन के साधन — के रूप में पुनर्स्थापित किया जाए।



“क्या राजनीति सिर्फ चुनाव जीतने तक सीमित है या सामाजिक बदलाव का माध्यम?”




राजनीति — यह शब्द सुनते ही आम लोगों के मन में दो तस्वीरें उभरती हैं: पहली, सत्ता की दौड़ में शामिल नेताओं की, और दूसरी, समाज की समस्याओं के समाधान की उम्मीद की। परंतु आज यह सवाल जरूरी हो गया है कि क्या राजनीति सिर्फ चुनाव जीतने तक सीमित रह गई है, या यह सामाजिक बदलाव का सशक्त माध्यम भी बन सकती है?

1. राजनीति का उद्देश्य — सत्ता या समाज?

भारत के लोकतंत्र में राजनीति मूलतः जनता की सेवा और समाज के उत्थान का माध्यम थी। गांधी, नेहरू, लोहिया, अंबेडकर, जयप्रकाश नारायण जैसे नेताओं ने राजनीति को सामाजिक परिवर्तन का औजार माना। उनके लिए सत्ता साधन थी, उद्देश्य नहीं। लेकिन समय के साथ राजनीति का चरित्र बदलता गया। आज अधिकांश दल और नेता चुनावी जीत को ही अंतिम लक्ष्य मानते हैं। नीति और विचारधारा की जगह अब जाति, धर्म और पैसों की ताकत ने ले ली है।

2. चुनाव के बाद राजनीति का मौन

चुनाव के दौरान नेता जनता के बीच जाकर विकास, रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य की बात करते हैं, परंतु जीत के बाद वही विषय उनके एजेंडे से गायब हो जाते हैं। राजनीति अब पांच वर्षों में एक बार जागने वाला उत्सव बन गई है। इस प्रवृत्ति ने जनता और नेताओं के बीच विश्वास का संकट पैदा किया है।

3. सामाजिक मुद्दों पर जन आंदोलन — राजनीति का असली रूप

जब-जब जनता ने राजनीति को सामाजिक सरोकारों से जोड़ा, तब-तब इतिहास ने परिवर्तन देखा।

स्वतंत्रता संग्राम से लेकर जेपी आंदोलन तक,

अन्ना हजारे के लोकपाल आंदोलन से लेकर महिलाओं और किसानों के अधिकारों की लड़ाई तक,
इन सबने दिखाया कि राजनीति सिर्फ सत्ता प्राप्ति नहीं, बल्कि जनचेतना जगाने का आंदोलन भी है।


राजनीति तब सार्थक होती है जब वह समाज के मौलिक प्रश्नों — जैसे शिक्षा, बेरोजगारी, पर्यावरण, महिला सशक्तिकरण, और समान अवसर — पर जनमत तैयार करे और ठोस बदलाव लाए।

4. राजनीतिक कार्यकर्ता — सेवक या करियरिस्ट?

आज का बड़ा प्रश्न यह भी है कि क्या राजनीतिक कार्यकर्ता अपने को सामाजिक परिवर्तन का वाहक मानता है या फिर राजनीति को रोजगार का विकल्प समझने लगा है?
अधिकांश युवा राजनीति में विचारधारा से ज्यादा भविष्य की सुरक्षा के लिए आते हैं। पार्टियों में टिकट, पद और पहचान पाने की होड़ में सामाजिक सरोकार पीछे छूट जाते हैं। परंतु कुछ अपवाद आज भी हैं — जो बिना किसी पद या लाभ के समाज के लिए कार्य कर रहे हैं, यही लोग राजनीति की असली आत्मा हैं।

5. भविष्य की राजनीति — जन और समाज के बीच सेतु

अगर राजनीति को फिर से जनआंदोलन से जोड़ना है, तो उसे

पारदर्शिता,

जवाबदेही,

नैतिकता
और

सामाजिक संवेदनशीलता
के सिद्धांतों पर खड़ा करना होगा।
राजनीतिक कार्यकर्ता को पार्टी का प्रचारक नहीं, बल्कि जनहित का प्रहरी बनना होगा।


निष्कर्ष:

राजनीति तब तक अधूरी है जब तक वह समाज की आत्मा को नहीं छूती। चुनाव जीतना राजनीति का हिस्सा है, पर उद्देश्य नहीं। असली राजनीति वही है जो जनता के जीवन में आशा, न्याय और समानता का संचार करे।
इसलिए अब वक्त है यह तय करने का — हम राजनीति को सत्ता का मंच मानते हैं या सामाजिक परिवर्तन का आंदोलन?


Wednesday, November 5, 2025

उत्तराखंड में अंधविश्वास, तंत्र-मंत्र और डायन-प्रथा की प्रचलन स्थिति एवं नियंत्रण हेतु नीतिगत सुझाव




🧾 भाग–1 : नीतिगत रिपोर्ट (Policy Brief)

विषय: उत्तराखंड में अंधविश्वास, तंत्र-मंत्र और डायन-प्रथा की प्रचलन स्थिति एवं नियंत्रण हेतु नीतिगत सुझाव

🔹 परिचय

उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में धार्मिक आस्था गहरी है, परंतु इसके साथ-साथ अंधविश्वास, झाड़-फूंक, तंत्र-मंत्र और “डायन” जैसी अवधारणाएँ भी कुछ क्षेत्रों में सामाजिक समस्या के रूप में मौजूद हैं।
ये प्रथाएँ विशेषकर महिलाओं, बुजुर्गों और कमजोर वर्गों के लिए मानसिक, सामाजिक और शारीरिक हिंसा का कारण बनती हैं।


🔹 मुख्य कारण

  1. शिक्षा और वैज्ञानिक दृष्टिकोण की कमी

  2. ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की सीमित उपलब्धता

  3. सामाजिक असमानता व लैंगिक भेदभाव

  4. धार्मिक आड़ में धोखाधड़ी करने वाले तथाकथित तांत्रिक व ओझा

  5. कानूनी जागरूकता का अभाव और पीड़ितों का डर


🔹 वर्तमान स्थिति

  • NCRB रिपोर्टों के अनुसार, “जादू-टोना” या “डायन” के आरोपों से जुड़ी हत्याएँ देशभर में होती हैं,
    हालांकि उत्तराखंड में आँकड़े अपेक्षाकृत कम हैं।

  • राज्य के कुछ पर्वतीय जिलों (जैसे चंपावत, बागेश्वर, पिथौरागढ़, अल्मोड़ा) से समय-समय पर
    झाड़-फूंक, भूत-प्रेत या “देवी-दर्शन” के नाम पर हिंसक या शोषणकारी घटनाएँ सामने आई हैं।

  • सरकार ने हाल ही में “फर्जी बाबाओं” और तांत्रिकों पर निगरानी बढ़ाई है, जो सकारात्मक कदम है।


🔹 प्रभाव

  • महिलाओं के प्रति हिंसा, सामाजिक बहिष्कार और मानसिक उत्पीड़न।

  • ग्रामीण समाज में भय और विभाजन।

  • आर्थिक दोहन (भेंट, चढ़ावा, नकली इलाज)।

  • कानून व्यवस्था और स्वास्थ्य व्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव।


🔹 सुझाव

  1. अंधविश्वास-निवारण अधिनियम:
    महाराष्ट्र मॉडल की तरह “अंधश्रद्धा निर्मूलन कानून” उत्तराखंड में भी लागू किया जाए।

  2. स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार:
    प्रत्येक ब्लॉक में मोबाइल हेल्थ यूनिट्स और महिला स्वास्थ्य स्वयंसेवक नियुक्त हों।

  3. शैक्षिक और सामाजिक अभियान:
    विद्यालयों, आंगनबाड़ी केंद्रों और ग्राम सभाओं के माध्यम से “वैज्ञानिक सोच” और “विवेक आधारित आस्था” पर कार्यक्रम।

  4. महिला सुरक्षा एवं पुनर्वास केंद्र:
    झूठे आरोपों से प्रभावित महिलाओं के लिए कानूनी सहायता और मनोवैज्ञानिक परामर्श।

  5. मीडिया व डिजिटल अभियान:
    सोशल मीडिया पर “#विश्वास_न_अंधविश्वास” जैसे अभियान चलाए जाएँ।

  6. फर्जी तांत्रिकों पर कानूनी कार्रवाई:
    धार्मिक या तांत्रिक आड़ में धोखाधड़ी करने वालों के लिए कड़ी सजा का प्रावधान।


🔹 निष्कर्ष

अंधविश्वास केवल अज्ञानता का नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना और स्वास्थ्य सेवाओं की कमजोरी का परिणाम है।
इसलिए सरकार, नागरिक समाज, धार्मिक संगठन और मीडिया — सभी को मिलकर
वैज्ञानिक दृष्टिकोण, संवेदनशील कानून और जनजागरूकता को प्राथमिकता देनी होगी।


✍️ भाग–2 : संपादकीय/लेख

शीर्षक:
🕯️ “जब विश्वास अंधा हो जाता है — उत्तराखंड में अंधविश्वास का सच”

🌿 लेख

उत्तराखंड की वादियाँ देवभूमि कहलाती हैं, पर इन्हीं घाटियों में कभी-कभी अंधविश्वास के अंधेरे भी छिपे मिलते हैं।
कहीं कोई तांत्रिक “देवी उतरने” का दावा करता है, तो कहीं किसी महिला को “डायन” कहकर समाज से अलग कर दिया जाता है।
सवाल यह है — 21वीं सदी में भी यह सब क्यों?

दरअसल, जब स्वास्थ्य सेवाएँ कमजोर हों, शिक्षा अधूरी हो और न्याय दूर लगे —
तब भय, बीमारी और दुर्भाग्य का कारण “जादू-टोना” में खोज लिया जाता है।
और यही वह क्षण होता है जब विश्वास, अंधविश्वास में बदल जाता है।

ग्रामीण समाज में महिलाएँ सबसे अधिक प्रभावित होती हैं।
जिनके पास जमीन नहीं, जिनकी आवाज़ कमजोर है — वे ही “डायन, जोगिन या कलंकित ” घोषित कर दी जाती हैं।
कई बार यह आरोप किसी की ज़मीन या प्रतिष्ठा हड़पने का हथियार बन जाता है।

उत्तराखंड सरकार ने हाल के वर्षों में फर्जी बाबाओं पर शिकंजा कसने की पहल की है,
लेकिन यह तभी पर्याप्त होगी जब शिक्षा और विज्ञान लोगों की आस्था के साथ-साथ चलें।
“देवभूमि” का अर्थ तभी पूरा होगा जब भक्ति के साथ विवेक भी जुड़ा हो।



अंधविश्वास कोई धर्म नहीं — यह भय की उपज है।
और भय को मिटाने का एक ही उपाय है — ज्ञान, संवेदना और सत्य का प्रकाश।


“उत्तराखंड आस्था-सुरक्षा एवं अंधविश्वास निवारण अधिनियम”



🌿 “उत्तराखंड आस्था-सुरक्षा एवं अंधविश्वास निवारण अधिनियम”

Udaen Foundation के माध्यम से प्रस्तुत करने की वैधानिक व व्यावहारिक रूपरेखा


🔹 1. संस्था की भूमिका

Udaen Foundation इस प्रस्ताव को एक जन-हित आधारित नीति अनुशंसा (Policy Recommendation) के रूप में राज्य सरकार को प्रस्तुत कर सकती है।
यह “धर्म या आस्था विरोधी” नहीं, बल्कि “मानवाधिकार, मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक न्याय” के पक्ष में पहल के रूप में जाएगी।


🔹 2. प्रस्तुति का कानूनी तरीका

आप तीन स्तरों पर इसे प्रस्तुत कर सकते हैं —

(a) जनहित ज्ञापन (Public Memorandum):

Udaen Foundation, अपने लेटरहेड पर अधिनियम का ड्राफ्ट व औचित्य नोट संलग्न कर मुख्यमंत्री, विधि मंत्री, और मुख्य सचिव को ज्ञापन दे सकती है।

(b) राज्य नीति आयोग या समाज कल्याण विभाग को सिफारिश:

यह अधिनियम “समाज कल्याण”, “महिला एवं बाल विकास”, “मानवाधिकार” और “गृह विभाग” सभी से जुड़ा है। इसलिए फाउंडेशन “समाज कल्याण विभाग” के अंतर्गत नीति प्रस्ताव के रूप में फाइल कर सकती है।

(c) जन-जागरूकता और शोध-पत्र:

आप इस ड्राफ्ट को Policy Paper + Field Report के रूप में तैयार कर

  • प्रेस कॉन्फ़्रेंस,

  • Udaen News Network,

  • तथा शैक्षणिक संस्थानों (जैसे HNB Garhwal University, Doon University आदि)
    के समक्ष रख सकते हैं।


🔹 3. आवश्यक दस्तावेज़

  1. फाउंडेशन का पंजीकरण प्रमाणपत्र और CSR/NGO परिचय।

  2. प्रस्तावित अधिनियम (Draft Bill)।

  3. औचित्य नोट (Justification Note) — जिसमें आप स्पष्ट करेंगे कि यह

    • धार्मिक स्वतंत्रता का विरोध नहीं करता,

    • बल्कि परिवार, महिला, बच्चों और कमजोर वर्गों को “झाड़-फूंक, जगर, या देवी-प्रभाव” के नाम पर हो रहे शोषण से बचाने के लिए है।

  4. 6-महीने की कार्यान्वयन रूपरेखा (Implementation Roadmap)


🔹 4. जनसहयोग मॉडल (Public Participation)

Udaen Foundation इसे जनता से जोड़ सकती है:

  • अंधविश्वास से आज़ादी” नामक ऑनलाइन हस्ताक्षर अभियान (petition)।

  • जिलास्तरीय संवाद — “जगर या जागरूकता?” विषय पर सेमिनार/चर्चा।

  • मीडिया कवरेज — Udaen News Network के माध्यम से विशेष कवरेज और रिपोर्ट सीरीज़।


🔹 5. संविधानिक औचित्य (Legal Validity)

इस कानून का संविधान में पूरा आधार है:

  • अनुच्छेद 21: जीवन और गरिमा का अधिकार।

  • अनुच्छेद 25: धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार, जब तक वह सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता या स्वास्थ्य के विपरीत न हो।

  • अनुच्छेद 51-A(h): नागरिक का कर्तव्य है कि वह वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवता और सुधार की भावना विकसित करे।

👉 इसलिए यह अधिनियम संविधान-सम्मत और धर्म-निरपेक्ष दोनों रहेगा।


🔹 6. राज्यस्तरीय सहयोग

 इसे प्रारंभिक चरण में निम्न संस्थाओं के साथ साझा कर सकते हैं:

  • उत्तराखंड समाज कल्याण विभाग

  • उत्तराखंड महिला आयोग / बाल अधिकार संरक्षण आयोग

  • उत्तराखंड मानवाधिकार आयोग

  • विधि विभाग / विधायी विभाग सचिवालय, देहरादून


🔹 7. Udaen Foundation के लिए आगामी कदम

  1. अंधविश्वास निवारण अधिनियम (उत्तराखंड) प्रस्तावित” ड्राफ्ट को अंतिम रूप दें।

  2. उसके साथ “औचित्य नोट” जोड़ें (2–3 पृष्ठ)।

  3. 6 महीने की पायलट कार्ययोजना (Implementation Framework) संलग्न करें।

  4. सब कुछ एक संयुक्त PDF ज्ञापन-पैकेट में तैयार करें।

  5. देहरादून में संबंधित विभागों को ज्ञापन सौंपें और मीडिया में रिलीज़ दें।



उत्तराखंड: “आस्था-सुरक्षा और अंधविश्वास निवारण (प्रस्तावित) अधिनियम” — आउटलाइन

“जागर, पाखंड या देवी-देवता के नाम पर परिवार टूटना, बलात्कार, मानसिक उत्पीड़न, और आर्थिक शोषण” जैसी घटनाएँ देखी जाती हैं। 


उत्तराखंड: “आस्था-सुरक्षा और अंधविश्वास निवारण (प्रस्तावित) अधिनियम” — आउटलाइन

1) उद्देश्य (Purpose)

उत्तराखंड की सांस्कृतिक और धार्मिक विविधता का सम्मान करते हुए यह अधिनियम लक्ष्य करेगा:

  • जगर/भूत-प्रेत/चमत्कार के नाम पर परिवारों का विघटन, जबरन वंश-भंग, घरेलू हिंसा और आर्थिक दुरुपयोग रोकना;

  • धार्मिक विश्वास को निशाना बनाए बिना शोषण और हिंसा को दंडित करना;

  • जन-सुरक्षा, तर्कशील शिक्षा और पीड़ित संरक्षण को सुनिश्चित करना।


2) मुख्य परिभाषाएँ (Selected Definitions)

(नियमों में स्पष्ट परिभाषाएँ अनिवार्य हैं ताकि धर्म-स्वतंत्रता पर असर न हो)

  • आस्था-कृत्य: पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठान जिनका उद्देश्य पूजा/परंपरा है और जिनसे शारीरिक-मानसिक/आर्थिक क्षति न हो।

  • अंधविश्वासी शोषण: किसी व्यक्ति/समूह द्वारा जगर, चमत्कार, भूत-प्रेत आदि का दावा कर डर, भलाई के बहाने धन/स्वतंत्रता/रेप/वंश-विच्छेद आदि कराना।

  • खतरनाक कर्मकांड: ऐसे कर्मकांड जो शारीरिक चोट, मजबूरी, बाल-श्रम, मानव-बलि या परिवारिक तोड़फोड़ का कारण बनें।

  • सांस्कृतिक अपवाद: परंपरागत कर्मकांड जिन्हें समाज-स्वीकृति है और जो किसी भी व्यक्ति को शारीरिक/मानसिक/आर्थिक हानि नहीं पहुँचाते — वे इस अधिनियम की दण्डनीय सूची से अलग रखे जा सकेंगे (बशर्ते वे किसी का शोषण न करें)।


3) अपराध-धाराएँ और दंड (Examples)

(न्यायिक मर्यादा के साथ — बाल/महिला सुरक्षा के हिसाब से कड़े प्रावधान)

  • धारा A — आस्था के बहाने धोखा/ठगी: १–५ वर्षों की कैद और ₹50,000–₹2,00,000 जुर्माना।

  • धारा B — परिवारिक तोड़फोड़ (जबरन वंश-विच्छेद/त्याग): ३–७ वर्षों की कैद और उच्च जुर्माना; पीड़ित परिवार के पुनर्संयोजन के लिए सरकारी सहायता।

  • धारा C — शारीरिक/मानसिक शोषण (झाड़-फूंक के दौरान): गैर-जमानती, ५–१० वर्ष तक की सजा।

  • धारा D — मानव-बलि/बच्चों का उपयोग/बाल-श्रम: कठोर दंड, ७–१२ वर्ष तक।

  • धारा E — दोहराव/संगठित गिरोह: दंड दोगुना और संगठन के खिलाफ संपत्ति जब्ती की अनुमति।


4) संरक्षण प्रावधान (Protection & Relief)

  • पीड़ितों के लिये तात्कालिक शेल्टर और कानूनी सहायता; मानसिक स्वास्थ्य काउंसलिंग।

  • वकील/NGO द्वारा नि:शुल्क प्रतिनिधित्व।

  • गवाह सुरक्षा और गवाह-बचाव प्रावधान।

  • पारिवारिक पुनर्संयोजन प्रोग्राम तथा आर्थिक नुकसान की आंशिक भरपाई/रिहैबिलिटेशन।


5) लागू करने की संरचना (Institutional Mechanism)

  • राज्य अंधविश्वास-निवारण प्रकोष्ठ (State Cell) — नीति, निगरानी, पायलट और डेटा-रिपोर्टिंग।

  • जिला-स्तर नोडल अधिकारी (DNO) — हर जिले में ट्रेनिंग, शिकायत-हैंडलिंग, और पंचायत-काइटिंग।

  • स्थल-विशेष निगरानी समितियाँ — जगर/झाड़-फूंक के बड़े केंद्रों (जैसे कुछ ग्रामों में होने वाले जगर) पर स्थानीय प्रशासन + सामाजिक कार्यकर्ता + धर्मगुरु का समावेश।

  • फास्ट-ट्रैक पैनल — पीड़ित मामलों के लिए समयबद्ध सुनवाई।


6) सांस्कৃতিক संवेदनशीलता और लोक-परंपरा का संरक्षण

  • अधिनियम स्पष्ट करेगा: आस्था-अभिव्यक्ति पर रोक नहीं, केवल जब यह किसी का शोषण/हानि कर दे तो कार्रवाई होगी।

  • स्थानीय पंडित, ज्योतिषी, भानगे/बाजार-नेताओं के साथ संवाद — उन्हें ट्रेनिंग और रजिस्ट्रेशन के विकल्प दिए जाएँ।

  • परंपरागत विधियों का दस्तावेजीकरण और यदि आवश्यक हो तो वैकल्पिक सामाजिक अनुष्ठानों का प्रचार, ताकि परंपरा टिके पर हानि न हो।


7) शिक्षा-और-समुदाय कार्यक्रम (Prevention)

  • स्कूलों में critical thinking, स्वास्थ्य शिक्षा और मानव अधिकारों की पढ़ाई।

  • ग्राम सभाओं/पंचायतों में जागरूकता-बैठकें; महिला समूहों को सशक्त बनाना।

  • धार्मिक/समाज-नेताओं के साथ “सुरक्षित जगर” समझौते — सार्वजनिक नियम जैसे भीड़-नियंत्रण, अनुमति-पत्र, और किसी चिकित्सा मामले में चिकित्सक की अपील।


8) तत्काल क्रियावली (6-महीने पायलट योजना)

  1. महीना 1: स्थिति मानचित्रण — उच्च-जोखिम गांवों/स्थलों की सूची (जगर केंद्र) बनाना।

  2. महीना 2: कानूनी मसौदा + स्थानीय परामर्श — समुदायों के साथ परामर्श।

  3. महीना 3–4: पायलट लागू — 2–3 जिलों में DNO, हॉटलाइन, और फास्ट-ट्रैक मामला संचालन।

  4. महीना 5: प्रशिक्षण और जन-जागरूकता — पुलिस/स्वास्थ्यकर्मी/पंचायतों का प्रशिक्षण।

  5. महीना 6: मूल्यांकन और विस्तार योजना — प्रभाव रिपोर्ट के आधार पर राज्य-व्यापी रोल-आउट।


9) चुनौतियाँ और बचाव रणनीतियाँ

  • धार्मिक प्रतिरोध: स्पष्ट संदेश — “धर्म नहीं, शोषण पर कार्रवाई”। समुदाय-नेताओं को जोड़ना ज़रूरी।

  • पुलिस और प्रशासन की नॉलेज-गैप: व्यापक प्रशिक्षण और SOPs।

  • गवाह और पीड़ितों का डर: त्वरित सुरक्षा एवं माहौल-सुरक्षा।

  • संविधानिक चुनौतियाँ: कानून को धर्म-स्वतंत्रता के खिलाफ नहीं बनाना — कानूनी समीक्षा और विधि-विशेषज्ञों की संलिप्तता आवश्यक।


10) नमूना क्लॉज़-टेक्स्ट (संक्षेप)

धारा X(1): किसी भी व्यक्ति द्वारा देवी-देवता, जगर, आत्मा या किसी अलौकिक शक्ति के नाम पर किसी अन्य व्यक्ति को डराकर, धमका कर, या धोखा देकर धन/संपत्ति/स्वतंत्रता/यौन सम्बन्ध आदि के लिए बाध्य करना दंडनीय अपराध होगा।
धारा X(2): उपधारा (1) के अंतर्गत दोषी पाए जाने पर ३ वर्ष तक की कैद तथा ₹1,00,000 तक जुर्माना अथवा दोनों हो सकते हैं।
धारा Y: यदि दोषी व्यक्ति ने बाल या मानसिक रूप से असमर्थ व्यक्ति का अपमान/कठोर व्यवहार किया तो दंड ५–१० वर्ष तक होगा।
धारा Z: स्थानीय पंचायत/मंदिर प्रबंधन के लिए अनिवार्य है कि वे किसी भी सार्वजनिक अनुष्ठान के दौरान स्वास्थ्य व सुरक्षा विनियमों का पालन कराएँ और यदि किसी भी प्रकार का शोषण हो तो प्रशासन को तुरंत सूचित करें।



"राजस्थान धर्म-संवेदनशीलता और अंधविश्वास निवारण अधिनियम" (या छोटा नाम – "Faith & Rationality Protection Act")


अगर राजस्थान में बालाजी महाराज (हनुमान) और खाटू श्याम से जुड़े अंधविश्वास या धोखाधड़ी जैसी गतिविधियाँ बढ़ रही हैं — जैसे:

  • चमत्कार दिखाने के नाम पर धन एकत्र करना,

  • लोगों को डराकर चढ़ावा या दान लेना,

  • मानसिक रोगों या चिकित्सा मामलों को “देवी-देवता का प्रकोप” बताकर इलाज से दूर रखना,
    तो इस पर कानूनी नियंत्रण लाना संभव है।

🔹 कानूनी ढांचा प्रस्ताव:

"राजस्थान धर्म-संवेदनशीलता और अंधविश्वास निवारण अधिनियम"
(या छोटा नाम – "Faith & Rationality Protection Act")

🔹 उद्देश्य:

  1. देवी-देवता, आत्मा, भूत-प्रेत, चमत्कार आदि के नाम पर ठगी, डर या शोषण को रोकना।

  2. धार्मिक आस्था को संरक्षित रखते हुए अंधविश्वास, धोखे, और शारीरिक या मानसिक हानि से जनता की रक्षा करना।

  3. वैज्ञानिक सोच और तर्कशील दृष्टिकोण को बढ़ावा देना।


🔹 संभावित धाराएँ:

  1. धारा 1 – अंधविश्वास पर आधारित ठगी दंडनीय अपराध होगा।

    • यदि कोई व्यक्ति “चमत्कार दिखाने”, “देवी प्रकोप उतारने”, “भूत भगाने” या “दान से मोक्ष देने” का झूठा दावा कर धन/संपत्ति लेता है, तो
      ➤ उसे 3 वर्ष तक की सजा और ₹50,000 तक का जुर्माना।

  2. धारा 2 – स्वास्थ्य और शिक्षा में अंधविश्वास फैलाना प्रतिबंधित।

    • यदि किसी धार्मिक या सामाजिक व्यक्ति द्वारा किसी रोग या शिक्षा से जुड़े विषय में वैज्ञानिक उपचार या शिक्षा से लोगों को दूर किया जाए।

  3. धारा 3 – धार्मिक भावनाओं का सम्मान।

    • कोई भी व्यक्ति आस्था के स्थलों या पूजा-पद्धति में हस्तक्षेप नहीं करेगा जब तक कि वहां अपराध, शोषण या धोखाधड़ी न हो।

  4. धारा 4 – तर्कशीलता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण संवर्धन परिषद

    • राज्य स्तर पर एक परिषद बनेगी जो शिक्षा, मीडिया और समाज में वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देगी।


🔹 सामाजिक लाभ:

  • धार्मिक आस्था सुरक्षित रहेगी लेकिन ठग और पाखंडी तंत्र कमजोर होंगे।

  • असली भक्ति और सामाजिक जिम्मेदारी मजबूत होगी।

  • गरीब और अशिक्षित लोग ठगी से बचेंगे।



“राजस्थान अंधविश्वास निवारण एवं मानव सुरक्षा अधिनियम, 2025”


📘 “राजस्थान अंधविश्वास निवारण एवं मानव सुरक्षा अधिनियम, 2025”
(ड्राफ्ट बिल + कार्यान्वयन योजना)

यह प्रस्ताव मेहंदीपुर बालाजी, खाटू श्यामजी जैसे स्थलों पर बढ़ते अंधविश्वास, शोषण, और हिंसा को रोकने के उद्देश्य से होगा — धर्म या आस्था के खिलाफ नहीं, बल्कि धोखे, भय और हिंसा के खिलाफ।


I. प्रस्तावना (Preamble)

राजस्थान राज्य की जनता के हित में यह आवश्यक है कि अंधविश्वास, चमत्कारों के झूठे दावों, झाड़-फूंक, मानव बलि, और ऐसी किसी भी अमानवीय प्रथा के माध्यम से नागरिकों के शोषण को रोका जाए तथा समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण और तर्कसंगत सोच को बढ़ावा दिया जाए।
अतः राजस्थान विधानमंडल यह अधिनियम पारित करता है:


II. नाम और प्रारंभ

इस अधिनियम को कहा जाएगा —
👉 “राजस्थान अंधविश्वास निवारण एवं मानव सुरक्षा अधिनियम, 2025”
यह अधिनियम राज्यपाल की स्वीकृति के पश्चात समूचे राजस्थान राज्य में लागू होगा।


III. उद्देश्य (Objectives)

  1. चमत्कार, तांत्रिक कर्मकांड या झाड़-फूंक के नाम पर नागरिकों को धोखा देने से रोकना।

  2. मानव बलि, पशु बलि, या किसी भी अमानवीय धार्मिक कृत्य को अपराध घोषित करना।

  3. धर्मस्थलों पर होने वाले झूठे “चमत्कार प्रदर्शन” और मानसिक शोषण को रोकना।

  4. जनता में वैज्ञानिक सोच, मानवता और संविधानसम्मत आस्था का प्रसार करना।


IV. परिभाषाएँ (Definitions)

  1. अंधविश्वास — कोई भी ऐसी आस्था या प्रथा जो प्रमाण, तर्क या वैज्ञानिक परीक्षण से परे हो और जिसके कारण शारीरिक, मानसिक या आर्थिक शोषण होता हो।

  2. चमत्कार का दावा — जब कोई व्यक्ति या संस्था यह कहे कि उसके पास अलौकिक या दिव्य शक्ति है जिससे रोग, समस्या या पाप मिट सकते हैं।

  3. मानव बलि/अमानवीय प्रथा — किसी व्यक्ति या पशु को धार्मिक उद्देश्य से हानि पहुँचाना।

  4. झाड़-फूंक या तांत्रिक कर्मकांड — ऐसी गतिविधि जिससे व्यक्ति की स्वतंत्रता, शारीरिक अखंडता या मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचे।


V. दंड (Penalties)

  1. अंधविश्वास के नाम पर धोखा देना: 6 माह से 3 वर्ष तक की कैद या ₹50,000 तक जुर्माना।

  2. मानव या पशु बलि देना: 7 वर्ष तक की सख्त कैद और ₹1 लाख तक जुर्माना।

  3. धोखे से ‘चमत्कार’ का प्रदर्शन या झूठा प्रचार: 1 से 5 वर्ष तक की कैद।

  4. पीड़ित को शारीरिक या मानसिक हानि पहुँचाने पर: गैर-जमानती अपराध, 5 वर्ष तक कैद।

  5. दोहराव की स्थिति में: दोगुना दंड।


VI. लागू करने की व्यवस्था (Implementation Mechanism)

  1. विशेष प्रकोष्ठ (Special Cell): राज्य स्तर पर “अंधविश्वास निवारण प्रकोष्ठ” का गठन।

  2. पुलिस प्रशिक्षण: प्रत्येक जिला पुलिस में नोडल अधिकारी नियुक्त किया जाएगा जो इस अधिनियम की निगरानी करेगा।

  3. मंदिर/धार्मिक स्थलों के लिए निर्देश:

    • मेहंदीपुर बालाजी और खाटू श्यामजी जैसे स्थलों पर CCTV निगरानी अनिवार्य।

    • झाड़-फूंक, भूत-प्रेत निकासी, या मानसिक उत्पीड़न जैसी गतिविधियों पर रोक।

    • केवल पंजीकृत पुजारी/संचालक को धार्मिक अनुष्ठान करने की अनुमति।

  4. जन-जागरूकता:

    • स्कूलों, कॉलेजों, पंचायतों और मीडिया के माध्यम से “धर्म नहीं, धोखा रोको” अभियान।

    • राज्य शिक्षा विभाग द्वारा वैज्ञानिक सोच पर आधारित विशेष कक्षाएँ।


VII. संरक्षण और सहायता (Protection & Support)

  1. पीड़ित व्यक्ति या गवाह को पुलिस सुरक्षा दी जाएगी।

  2. ऐसे मामलों के लिए त्वरित अदालत (Fast Track Court) गठित की जाएगी।

  3. गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) को शिकायतों के संकलन और जन-जागरूकता में भागीदारी दी जाएगी।


VIII. विशेष प्रावधान (Special Provisions for Religious Sites)

  1. मेहंदीपुर बालाजी और खाटू श्यामजी जैसे प्रमुख स्थलों पर:

    • भीड़ नियंत्रण और स्वास्थ्य सहायता केंद्र अनिवार्य।

    • धार्मिक कर्मकांड के दौरान किसी व्यक्ति पर हिंसा, बेहोशी, मारपीट या जंजीरबंदी को अपराध माना जाएगा।

    • जिला प्रशासन द्वारा निगरानी समिति (Collector की अध्यक्षता में) गठित की जाएगी।

  2. मंदिर प्रबंधन को प्रत्येक वर्ष “सुरक्षित आस्था रिपोर्ट” राज्य सरकार को देनी होगी।


IX. सामाजिक जागरूकता योजना (6-महीने की कार्ययोजना)

चरण अवधि प्रमुख गतिविधि जिम्मेदार एजेंसी
1. प्रारंभिक समीक्षा 1 माह मौजूदा कानूनों और घटनाओं का अध्ययन (बालाजी, खाटू) विधि विभाग
2. मसौदा व अनुमोदन 2 माह ड्राफ्ट बिल तैयार कर मंत्रिमंडल में प्रस्तुत करना गृह विभाग
3. पायलट लागू क्षेत्र 3-4 माह दो धार्मिक स्थलों पर पायलट — CCTV, पोस्टर, निगरानी जिला प्रशासन
4. जन-जागरूकता अभियान 4-6 माह मीडिया, स्कूल, सोशल कैंपेन सूचना विभाग + NGOs
5. निगरानी मूल्यांकन 6 माह प्रभाव मूल्यांकन रिपोर्ट योजना विभाग

X. निष्कर्ष

“आस्था यदि ज्ञान के साथ है, तो वह शक्ति है;
लेकिन जब वह भय और धोखे में बदल जाए —
तब कानून का हस्तक्षेप ज़रूरी है।”

यह अधिनियम राजस्थान में आस्था की गरिमा को बनाए रखते हुए अंधविश्वास, भय और शोषण को समाप्त करने का उद्देश्य रखता है।


राजस्थान में मेहंदीपुर बालाजी/खाटूश्याम जैसे स्थलों पर बढ़ते अंधविश्वास को रोकने के लिए विशेष कानूनी और नीतिगत कदम उठाये जाएँ।

 राजस्थान में मेहंदीपुर बालाजी/खाटूश्याम जैसे स्थलों पर बढ़ते अंधविश्वास को रोकने के लिए विशेष कानूनी और नीतिगत कदम उठाये जाएँ। 

 क्या-क्या किया जा सकता है, किस तरह के कानून मॉडल उपलब्ध हैं, और लागू करने में क्या चुनौतियाँ रहेंगी। 


1) क्या राज्य ऐसा कानून ला सकता है? — हाँ, और आधार क्या है

  • राज्य विधानमंडल के पास सामाजिक सुधार और लोक-व्यवस्था से संबंधित विषयों पर कानून लाने का अधिकार है। महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों ने इसी आधार पर “Anti-superstition / Black-magic” प्रकार के क़ानून बनाए हैं जिनमें धोखा देने, मानव बलि, दुष्प्रथा और हिंसा जैसी प्रथाओं को अपराध कहा गया है। (India Code)

  • राजस्थान में पहले से ही “Rajasthan Prevention of Witch-Hunting Act, 2015” जैसी व्यवस्था है जो witch-hunting (डायन-शिकायत, उत्पीड़न) रोकने के लिए मौजूद है — पर यह व्यापक तौर पर हर तरह के 'चमत्कार/झाड़-फूंक/धोखे' को कवर नहीं करता। यदि उद्देश्य मेहंदीपुर बालाजी जैसे धार्मिक/आस्था स्थलों पर व्याप्त शोषण और हिंसा को रोकना है, तो राज्य नया व्यापक कानून या मौजूदा कानूनों का विस्तार कर सकता है। (Integral University)


2) कौन-से मॉडल अपनाये जा सकते हैं (उदाहरण)

  1. महाराष्ट्र मॉडल (2013) — काफ़ी व्यापक: मानव बलि, inhuman/aghori प्रथाएँ, “चमत्कार” के दावों के जरिए धोखा और प्रचार पर पाबंदी। इसे राज्य स्तर पर लागू किया गया। (India Code)

  2. कर्नाटक एक्ट (2017) — inhuman practices और black magic को अपराध मानता है; लागू करने और परिभाषा-निर्धारण पर लंबी बहस भी रही। (India Code)

  3. राजस्थान-विशेष (वर्तमान + विस्तार) — राजस्थान के पास witch-hunting के खिलाफ कानून है; राज्य चाहे तो उसे broaden कर ‘अंधविश्वास निवारण और मानव सुरक्षा अधिनियम’ जैसा रूप दे सकता है (मेहंदीपुर जैसे स्थानों पर सार्वजनिक सुरक्षा और धोखे पर विशेष प्रावधानों के साथ)। (Integral University)


3) कानून में किन बातों को शामिल किया जाए (प्रस्तावित मुख्य प्रावधान)

  • परिभाषाएँ स्पष्ट हों — ‘चमत्कार का दावा’, ‘झाड़-फूंक/बाबा-प्रचार’, ‘मानसिक/आर्थिक शोषण’, ‘मानव बलि/हिंसा’ — ताकि धर्म/आस्था के सामान्य अधिकार पर असर न पड़े।

  • स्पष्ट अपराध-धाराएँ — चमत्कार के नाम पर धोखा (दंड), शारीरिक/मानसिक उत्पीड़न, बच्चों/कनिष्ठों के साथ अत्याचार, और भौतिक प्रमाण के बिना रोग/उपचार के झूठे दावे कर आर्थिक शोषण पर सजा।

  • प्रोसीजर/इन्फोर्समेंट — विशेष पुलिस-कोईलिशन या डायरेक्टर(प्रिवेंशन ऑफ अंधविश्वास) इकाई, तेज़ ट्रायल और पब्लिक-विजिलेंस विंग।

  • जनजागरूकता और शिक्षा — मंदिरों/धार्मिक समितियों के साथ संवाद, साधु-संतों को प्रशिक्षित करना, और स्कूलों में वैज्ञानिक शिक्षा/critical thinking कार्यक्रम।

  • प्रोटेक्शन-क्लॉज — पीड़ितों और गवाहों की सुरक्षा (गवाहों को धमकाने पर सख्त दंड)।

(इन बिंदुओं का उपयोग आप एक प्रारूप बिल में कर सकते हैं।)


4) मेहंदीपुर बालाजी/खाटूश्याम जैसे स्थानों पर विशेष कदम

  • स्थल-विशेष निर्देश: तीव्र भीड़ प्रबंधन, अनिवार्य CCTV, मंदिर प्रबंधन को लाइसेंस/रजिस्ट्रेशन और उनकी गतिविधियों पर पारदर्शिता, और यदि कोई ‘देवी-प्रेत निकालने’ के दौरान हिंसा होती है तो तीव्र कार्रवाई। (मीडिया रिपोर्टों में मेहंदीपुर के ‘prets’ वाली परंपराओं का ज़िक्र है — जहाँ लोग आत्माओं की पेशी का दावा करते हैं)। (https://rajasthan.ndtv.in/)

  • स्थानीय समाज-नेताओं/पंडितों के साथ गठजोड़: धार्मिक नेताओं को साथ लेकर जागरूकता चलाना ताकि वे अंधविश्वास और शोषण के बीच का फर्क लोगों को समझाएँ।

  • सख्त दंड और त्वरित कार्रवाई: जहाँ भी वीडियो/सबूत मिलें, तुरन्त प्राथमिकी और पब्लिक-इंगेजमेंट।


5) लागू करने में चुनौतियाँ (हकीकत)

  • धार्मिक संवेदनशीलता: कानून को “धर्म-विरोधी” नहीं दिखाना चाहिए; यही सबसे बड़ा राजनीतिक और सामाजिक जोखिम है।

  • पुलिस/एडमिन जागरूकता व प्रशिक्षण का अभाव — कई मामलों में पुलिस कानून की धाराओं से अनभिज्ञ रहती है, इसलिए प्रशिक्षण जरूरी है। (यह चुनौती महाराष्ट्र-कर्नाटक के लागू होने पर भी सामने आई थी)। (The Indian Express)

  • गवाहों का डर और दबाव — स्थानीय दबाव से लोग शिकायत करने से डरते हैं; संरक्षण तंत्र आवश्यक है।

  • राजनीतिक इच्छाशक्ति — बिना नेतृत्व और संचार-रणनीति के क़ानून केवल कागज़ों पर रह सकते हैं।


6) तुरन्त उठाये जाने योग्य कदम (प्राथमिकता-सूची)

  1. मौजूदा कानूनों का परीक्षण-अध्ययन (Rajasthan Witch-Hunting Act) — कहाँ कमी है, क्या बढ़ाने की जरूरत। (Integral University)

  2. कानून-मॉडल चुनना/ड्राफ्ट करना — महाराष्ट्र/कर्नाटक के प्रावधानों से उपयुक्त धाराएँ लेकर राज्य अनुकूल ड्राफ्ट बनाना। (India Code)

  3. पुलिस/प्रोविन्सियल ट्रेनिंग और स्पेशल यूनिट की स्थापना।

  4. स्थानीय जागरूकता-अभियान (मंदिर समितियों, NGOs, स्कूल) — “धर्म नहीं — धोखा रोको” जैसा संदेश।

  5. पायलट-प्रोजेक्ट: मेहंदीपुर/खाटूश्याम जैसे हाई-रिस्क स्थलों पर पायलट लागू कर प्रभाव मापा जाए। (https://rajasthan.ndtv.in/)



अंधविश्वास, ढोंग और चमत्कारों के नाम पर शोषण जैसे मुद्दे आज भी उत्तराखंड जैसे संवेदनशील पहाड़ी समाज में मौजूद हैं।

 अंधविश्वास, ढोंग और चमत्कारों के नाम पर शोषण जैसे मुद्दे आज भी उत्तराखंड जैसे संवेदनशील पहाड़ी समाज में मौजूद हैं।

अब देखें, कानूनी रूप से उत्तराखंड में ऐसा “Anti-Superstition Act” लाया जा सकता है या नहीं, तो जवाब है —
👉 हाँ, बिल्कुल लाया जा सकता है।

आइए विस्तार से समझते हैं 👇


⚖️ 1. संवैधानिक आधार (Constitutional Basis)

भारत के संविधान में राज्य सरकारों को यह अधिकार है कि वे “लोक व्यवस्था, स्वास्थ्य, नैतिकता और सामाजिक सुधार” से जुड़े विषयों पर कानून बना सकती हैं।
यह अधिकार राज्य सूची (State List) और समवर्ती सूची (Concurrent List) में आता है।

इसलिए, उत्तराखंड सरकार चाहे तो महाराष्ट्र या कर्नाटक की तर्ज पर “अंधविश्वास निवारण अधिनियम” बना सकती है।


🏛️ 2. उदाहरण: महाराष्ट्र का कानून

महाराष्ट्र ने 2013 में एक ऐतिहासिक क़ानून बनाया था —
👉 “Maharashtra Prevention and Eradication of Human Sacrifice and Other Inhuman, Evil and Aghori Practices and Black Magic Act, 2013”

इस कानून के तहत:

  • झाड़-फूंक, चमत्कार दिखाकर धोखा देना,

  • अंधविश्वास के नाम पर किसी को नुकसान पहुँचाना,

  • तांत्रिक या बाबा बनकर आर्थिक शोषण करना,

  • इंसानी बलि या काला जादू जैसी प्रथाओं को बढ़ावा देना
    अपराध माना गया है।

कर्नाटक ने भी 2017 में इसी तरह का कानून पारित किया।


🌄 3. उत्तराखंड में क्यों ज़रूरत है

उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में:

  • कई जगहों पर भूत-प्रेत, झाड़-फूंक, और चमत्कारों के नाम पर शोषण होता है।

  • “देव-प्रेत निकालने” या “देवी चढ़ने” के नाम पर महिलाओं के साथ हिंसा और सामाजिक बहिष्कार जैसी घटनाएँ होती हैं।

  • कुछ “बाबा” या “धर्मगुरु” अंधभक्ति के जरिए पैसा और प्रभाव बटोरते हैं।

ऐसे में यह कानून धार्मिक स्वतंत्रता को नहीं, बल्कि धोखे और शोषण को रोकने का औजार बन सकता है।


📜 4. संभावित नाम और ढाँचा (Draft Idea)

यदि उत्तराखंड में ऐसा कानून बनाया जाए, तो उसका नाम और उद्देश्य कुछ इस तरह रखा जा सकता है:

“उत्तराखंड अंधविश्वास निवारण एवं मानव सुरक्षा अधिनियम, 2025”

मुख्य प्रावधान हो सकते हैं:

  1. अंधविश्वास, काला जादू, या चमत्कार के नाम पर धोखा देने पर 6 माह से 5 वर्ष तक की सज़ा।

  2. झाड़-फूंक या देव-प्रेत निकालने के नाम पर किसी व्यक्ति को शारीरिक या मानसिक रूप से हानि पहुँचाने पर सख्त दंड।

  3. ऐसे मामलों में विशेष पुलिस प्रकोष्ठ और जन-जागरूकता अभियान

  4. स्कूलों में वैज्ञानिक सोच और तर्कसंगत दृष्टिकोण को बढ़ावा देने के कार्यक्रम।


🧭 5. चुनौतियाँ

  • धार्मिक संगठनों की गलतफहमी कि यह कानून “धर्म-विरोधी” है।

  • राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी।

  • पुलिस और प्रशासनिक प्रशिक्षण की कमी।

इन सबके बावजूद, अगर कानून का उद्देश्य स्पष्ट हो —

“धर्म नहीं, बल्कि धोखे के खिलाफ” —
तो यह समाज में एक बड़ा सुधारकारी कदम साबित हो सकता है।


🔹 निष्कर्ष

उत्तराखंड में अंधविश्वास और चमत्कारों के नाम पर शोषण रोकने के लिए कानून लाया जा सकता है —
बशर्ते सरकार इसे सामाजिक सुधार और वैज्ञानिक सोच के रूप में प्रस्तुत करे, न कि धार्मिक हस्तक्षेप के रूप में।



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