Sunday, August 3, 2025

"मैंने सोचना छोड़ दिया"



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🌿 1. कविता: "मैंने सोचना छोड़ दिया"

मैंने सोचा,
शराब पीना नुक़सानदायक है,
ज़हर है,
बुद्धि को छीन लेता है,
मन को भटका देता है।

सोचते-सोचते
ज़िंदगी ख़ुद भारी लगने लगी,
हर सवाल के पीछे
सिर्फ़ अँधेरा मिला।

फिर एक दिन...
मैंने सोचना छोड़ दिया।

अब न डर है,
न दिशा है,
न समझने की कोशिश...
बस एक जाम और ख़ामोशी।


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🍷 2. शायरी:

> सोचता था शराब बुरी चीज़ है,
ज़हर सी हर घूँट पी जाती है।

फिर सोचा —
असली ज़हर तो सोच में है...

इसलिए अब नशा नहीं छोड़ा,
सोचना छोड़ दिया।




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🎭 3. संवाद (डार्क कॉमेडी या नाटकीय दृश्य में उपयोग के लिए):

चरित्र A (गंभीरता से):
"क्यों पीते हो इतना? जानता नहीं, ये सेहत के लिए हानिकारक है?"

चरित्र B (हँसते हुए):
"पहले मैं भी यही सोचता था... कि शराब नुक़सानदेह है।"

चरित्र A:
"फिर?"

चरित्र B:
"फिर मैंने सोचना ही छोड़ दिया।"

(सन्नाटा)
(धीमे संगीत में शराब का जाम भरते हुए कैमरा पास आता है)



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