पिछले लगभग 10–15 सालों में भारत में हुए मुख्य कानून संशोधन / नीतिगत बदलाव शामिल हैं, जिनसे मानव और प्रकृति दोनों पर नकारात्मक असर पड़ा है।
🌏 भारत में कानून और नीतिगत बदलाव (मानव व प्रकृति पर प्रभाव)
1. पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) अधिसूचना, 2020 का ड्राफ्ट
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कई उद्योगों/प्रोजेक्ट्स को बिना पब्लिक कंसल्टेशन मंजूरी देने का प्रावधान।
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Post-facto clearance की अनुमति (यानी पहले प्रोजेक्ट शुरू करो, बाद में मंजूरी लो)।
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पर्यावरणीय पारदर्शिता कमज़ोर।
2. भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन अधिनियम (LARR), 2013 में संशोधन प्रयास (2014–15)
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मूल कानून में ग्रामसभा की सहमति और सामाजिक प्रभाव आकलन अनिवार्य था।
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संशोधनों के ज़रिए इन प्रावधानों को कमजोर करने की कोशिश।
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किसान और आदिवासी समुदायों में बड़े पैमाने पर विरोध।
3. वन संरक्षण अधिनियम (Forest Conservation Act), 1980 में संशोधन, 2023
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जंगल की परिभाषा को बदला गया।
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अब कई वन क्षेत्रों को गैर-वन उपयोग (industries, defense, infrastructure) के लिए खोला जा सकता है।
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स्थानीय समुदायों और जैवविविधता पर गहरा खतरा।
4. खनिज और खनन कानून (Mines and Minerals Development & Regulation Act), 2015 और 2021 संशोधन
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निजी कंपनियों के लिए खनन क्षेत्र खुला।
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कोयला और खनिज ब्लॉकों की नीलामी आसान।
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आदिवासी इलाकों में विस्थापन और पर्यावरणीय विनाश तेज़।
5. वन्यजीव संरक्षण अधिनियम संशोधन, 2022
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प्रोजेक्ट्स को मंजूरी आसान, "Schedule" में बदलाव।
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संरक्षण क्षेत्र (Eco-sensitive zones) कमजोर।
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कई उद्योगिक प्रोजेक्ट्स को छूट।
6. कामगारों के अधिकारों में कमी – 2020 के श्रम कोड्स (Labour Codes)
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श्रम कानूनों को चार कोड्स में समेटा गया।
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यूनियन बनाने, हड़ताल करने और सामाजिक सुरक्षा पाने के अधिकार कमजोर।
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मानव श्रम का शोषण आसान हुआ।
7. कोयला खनन और ऊर्जा नीतियाँ (2019–2022)
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कोयला खनन में 100% FDI की अनुमति।
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नवीकरणीय ऊर्जा पर ध्यान होने के बावजूद जंगलों और नदियों को बांध व खनन प्रोजेक्ट्स से नुकसान।
8. राइट टू फेयर कम्पन्सेशन एंड ट्रांसपेरेंसी अधिनियम को दरकिनार करने की प्रवृत्ति
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कई राज्यों ने अपने स्तर पर इसे कमजोर किया।
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किसानों और आदिवासियों को न्यूनतम मुआवज़ा और पुनर्वास तक नहीं।
9. जल प्रबंधन और नदी जोड़ो परियोजनाएँ (River Linking Projects)
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कानूनी सुरक्षा कमजोर।
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नदियों को सिर्फ़ "जल आपूर्ति स्रोत" मानकर प्रोजेक्ट पास।
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पारिस्थितिकी और स्थानीय संस्कृति को अनदेखा।
10. जंगल अधिकार कानून (Forest Rights Act, 2006) का कमजोर क्रियान्वयन
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कागज़ पर मजबूत कानून, पर ज़मीनी स्तर पर ग्रामसभाओं के अधिकार छीने गए।
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सुप्रीम कोर्ट ने भी 2019 में 11 लाख से अधिक आदिवासी परिवारों को बेदखल करने का आदेश दिया था (बाद में रोका गया)।
✅ निष्कर्ष:
इन बदलावों का सीधा असर —
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मानव पर: विस्थापन, बेरोज़गारी, आजीविका संकट, श्रम शोषण।
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प्रकृति पर: जंगल कटान, नदियों पर बांध, जैवविविधता का विनाश, जलवायु संकट।
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