Sunday, August 31, 2025

मानव और प्रकृति के विनाश ,कानूनों में किए गए बदलावों

भारत में जबरन या अप्रत्यक्ष रूप से हो रहे मानव और प्रकृति के विनाश (जैसे ज़बरन विस्थापन, भूमि अधिग्रहण, जंगलों का दोहन, नदियों का दोहन, खनन, औद्योगिक विस्तार आदि) का सीधा संबंध कई बार कानूनों में किए गए बदलावों से जोड़ा जाता है। इसके पीछे कुछ मुख्य कारण इस प्रकार हैं—


1. आर्थिक विकास बनाम पर्यावरण संरक्षण

  • सरकारें अक्सर तेज़ी से आर्थिक विकास (infrastructure projects, mining, industries, highways, dams) को प्राथमिकता देती हैं।

  • इसके लिए पर्यावरणीय नियमों (जैसे पर्यावरण प्रभाव आकलन, वन संरक्षण कानून, जन-सुनवाई की प्रक्रिया) को कमजोर किया जाता है।

  • उदाहरण: 2020 का नया EIA ड्राफ्ट (Environmental Impact Assessment), जिसमें कई उद्योगों और परियोजनाओं को बिना पब्लिक कंसल्टेशन के मंजूरी देने की छूट दी गई थी।


2. कॉरपोरेट हित और भूमि अधिग्रहण

  • भूमि अधिग्रहण कानूनों में समय-समय पर ऐसे संशोधन हुए हैं, जिनसे स्थानीय लोगों (किसान, आदिवासी, ग्रामीण) की सहमति को दरकिनार किया गया।

  • इससे ज़बरन विस्थापन और जीविका संकट पैदा होता है।

  • विशेष रूप से आदिवासी क्षेत्रों में FRA (Forest Rights Act, 2006) की अनदेखी कर खनन और औद्योगिक प्रोजेक्ट पास किए जाते हैं।


3. प्राकृतिक संसाधनों का निजीकरण

  • जल, जंगल और ज़मीन को "राष्ट्रहित" या "विकास" के नाम पर निजी कंपनियों को सौंपा जाता है।

  • कानूनों में संशोधन करके निजीकरण को आसान बनाया गया है।

  • उदाहरण: खनिज कानून (Mines and Minerals Act) में संशोधन कर निजी कंपनियों को सीधी खनन की छूट।


4. लोकतांत्रिक भागीदारी का क्षरण

  • पहले जनसुनवाई, ग्रामसभा की अनुमति और स्थानीय निकायों की सहमति अनिवार्य होती थी।

  • लेकिन अब कानूनों को इस तरह बदला जा रहा है कि जनता की राय कम मायने रखती है

  • इससे सीधे प्रभावित समुदाय अपनी आवाज़ नहीं उठा पाते।


5. प्रकृति को वस्तु मानना

  • नीति और कानून प्रकृति को सिर्फ़ संसाधन (resource) मानकर चलते हैं, जीवित इकाई (living entity) नहीं।

  • यही कारण है कि जंगल, नदियाँ, पहाड़ – सबको खनन, बांध, उद्योग के लिए बलि चढ़ा दिया जाता है।

  • हालाँकि न्यायपालिका ने कई बार (जैसे गंगा और यमुना को ‘Living Entity’ घोषित करने का प्रयास) प्रकृति को अधिकार देने की कोशिश की है।


6. सत्ता और पूँजी का गठजोड़

  • बड़े उद्योगपति और कॉरपोरेट घराने सरकार पर लॉबिंग करते हैं।

  • इसके परिणामस्वरूप कानून और नीतियाँ उनकी सुविधा के अनुसार ढाल दी जाती हैं।

  • आम जनता और पर्यावरण की कीमत पर कॉरपोरेट हितों को प्राथमिकता मिलती है।


निष्कर्ष:
कानूनों में बदलाव इसलिए होते हैं क्योंकि विकास मॉडल अभी भी पूंजी-प्रधान, उपभोग-प्रधान और शहरी केंद्रित है। इसमें मानव और प्रकृति की रक्षा को द्वितीयक माना जाता है। असली समाधान यह है कि—

  • कानूनों में जनभागीदारी और पर्यावरणीय संतुलन की गारंटी हो।

  • प्रकृति को अधिकार संपन्न इकाई (Rights of Nature) मानकर कानून बनाए जाएँ।

  • विकास को स्थानीय आजीविका, सतत् जीवन और पारिस्थितिकी संरक्षण से जोड़ा जाए।



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