स्थान: धराली, उत्तरकाशी
लेखक: दिनेश पाल सिंह गुसाईं
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प्रस्तावना:
वर्तमान में उत्तराखंड के उत्तरकाशी ज़िले के धराली और आसपास के क्षेत्रों में जो भीषण आपदा देखने को मिली है, वह केवल एक प्राकृतिक घटना नहीं है। यह केवल "क्लाउड बर्स्टिंग" (बादल फटना) का मामला नहीं, बल्कि एक समग्र पारिस्थितिक असंतुलन का नतीजा है, जिसमें मानव जनित गतिविधियाँ, अनियोजित विकास, और जलवायु परिवर्तन जैसे कई घटक मिलकर एक भयावह त्रासदी को जन्म दे रहे हैं।
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1. क्लाउड बर्स्टिंग (बादल फटना): प्राथमिक लेकिन अधूरी व्याख्या
धराली और उत्तरकाशी में आए अचानक तेज़ बारिश और बादल फटने की घटनाएँ हिमालयी क्षेत्रों में अब आम हो चुकी हैं। ये अत्यधिक संवेदनशील मौसमीय घटनाएँ तब होती हैं जब एक सीमित क्षेत्र में बहुत कम समय में भारी वर्षा होती है, जिससे नदियाँ उफनने लगती हैं, और भूस्खलन व बाढ़ जैसे हालात पैदा हो जाते हैं।
लेकिन क्या केवल यही कारण है?
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2. मानव जनित गतिविधियाँ: खुद को खोदती सभ्यता
अनियंत्रित निर्माण कार्य: पहाड़ी क्षेत्रों में होटलों, सड़कों, और इमारतों का बेतरतीब निर्माण, बिना भूगर्भीय अध्ययन के किया जा रहा है। इससे ज़मीन की पकड़ कमजोर होती है और भारी बारिश के समय भूस्खलन तेज़ हो जाता है।
ग्लेशियर क्षेत्रों में हस्तक्षेप: धराली जैसे क्षेत्र भागीरथी नदी और ग्लेशियर के नज़दीक स्थित हैं। यहाँ पर्यटन और निर्माण कार्यों से ग्लेशियर की प्राकृतिक स्थिति बाधित हो रही है, जिससे उसका पिघलाव तेज़ हो रहा है।
खनन और पेड़ों की कटाई: जंगलों की अंधाधुंध कटाई और नदियों से रेत-बजरी का दोहन स्थानीय पारिस्थितिकी को कमजोर बना रहा है।
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3. जलवायु परिवर्तन: बदलते मौसम की चेतावनी
उत्तरकाशी जैसे क्षेत्र अब वैश्विक जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभाव झेल रहे हैं।
मानसून पैटर्न का बदलाव
बिना मौसम की बारिश
तेज़ बर्फबारी और तेज़ी से पिघलना
इन कारणों से नदी तंत्र का संतुलन बिगड़ रहा है, जिससे अचानक बाढ़ जैसी आपदाएँ बढ़ गई हैं।
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4. पारंपरिक जल स्रोतों और मार्गों की उपेक्षा
पहले गांवों में जल निकासी के लिए गूलें, चाल-खाल, और नालों की व्यवस्था होती थी। आज वह सब सीमेंट की नालियों या सड़कों के नीचे दबा दी गई है। पानी का प्राकृतिक बहाव बाधित होने पर वही पानी विनाश का कारण बनता है।
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5. विकास बनाम विनाश: नीति में असंतुलन
विकास के नाम पर हाईवे, जलविद्युत परियोजनाएं, और पर्यटन कॉरिडोर बनाए जा रहे हैं, लेकिन इनकी सामाजिक और पर्यावरणीय मूल्यांकन (EIA) प्रक्रियाएँ या तो नाम मात्र की हैं या अनुपस्थित। स्थानीय समुदायों की चेतावनियों को नज़रअंदाज़ किया जाता है।
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6. आपदा प्रबंधन की कमज़ोर तैयारी
धराली जैसी दूरदराज़ जगहों में रेस्क्यू टीमों की देरी, संचार तंत्र की विफलता और राहत सामग्री की अनुपलब्धता यह दिखाती है कि उत्तराखंड जैसे आपदा-प्रवण राज्य में अब भी हमारी तैयारी सतही है।
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निष्कर्ष: प्रकृति का गुस्सा या हमारी लापरवाही?
धराली और उत्तरकाशी में आई आपदा सिर्फ बादल फटने की नहीं, हमारी विकास नीति, पर्यावरणीय दृष्टिकोण और जीवन शैली पर भी सवाल उठाती है। जब तक हम हिमालय की संवेदनशीलता को समझकर अपने निर्णय नहीं लेंगे, तब तक इस प्रकार की आपदाएँ केवल 'आपदा न्यूज़' बनती रहेंगी — और लोग, गाँव, सपने मलबे में दबते रहेंगे।
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प्रस्तावित समाधान:
1. पारिस्थितिकी आधारित विकास मॉडल लागू किया जाए।
2. स्थानीय समुदायों की भागीदारी के बिना कोई निर्माण कार्य न हो।
3. पारंपरिक जल और भूमि व्यवस्थाओं को पुनर्जीवित किया जाए।
4. "हिमालय नीति" को केंद्र में रखकर ही किसी विकास परियोजना को मंज़ूरी दी जाए।
5. हर गांव को आपदा-प्रबंधन के अनुकूल बनाया जाए।
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