वाकई, अगर कोई छात्र अपने समय का "सबसे ब्रिलिएंट" माना गया — यानी जिसकी बुद्धि तेज़ थी, जिसने शिक्षा में सर्वोत्तम प्रदर्शन किया — और फिर उसने वही ज्ञान युद्ध, विनाश या सत्ता के उपकरण बनाने में लगा दिया, तो यह सवाल वाजिब है कि उसकी सफलता को "गर्व" कहा जाए या "शर्म"।
यहाँ कुछ मुख्य बिंदु विचार योग्य हैं:
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1. ज्ञान का उद्देश्य क्या था?
शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ तकनीकी दक्षता नहीं होता, बल्कि मानवता, नैतिकता, और शांति की समझ भी देना होता है।
अगर कोई प्रतिभाशाली व्यक्ति नैतिकता से विहीन होकर केवल अपनी शक्ति, राष्ट्र या संगठन के लिए घातक उपकरण बनाए — चाहे वो मिसाइल हो, जासूसी तकनीक हो, या झूठ फैलाने वाली AI — तो वो ज्ञान अधूरा था।
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2. शिक्षकों की भूमिका:
अगर शिक्षक सिर्फ टॉप रैंक और IQ देखकर गर्वित होते हैं, लेकिन उस छात्र के आचरण, उद्देश्य और मानवीय मूल्यों की परवाह नहीं करते, तो उन्हें खुद से पूछना चाहिए —
"क्या मैंने इंसान तैयार किया या बस एक मशीन?"
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3. शांति बनाम शक्ति का भ्रम:
कई बार समाज यह मानता है कि रक्षा (defence) का मतलब है "हथियार बनाना"।
पर क्या सबसे समझदार दिमागों को शांति और समाधान खोजने में नहीं लगना चाहिए था?
महान वैज्ञानिकों (जैसे आइंस्टीन) ने खुद अपने आविष्कारों के दुष्परिणाम देखकर अंत में ग्लानि महसूस की।
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4. आख़िर सवाल यह है:
> क्या प्रतिभा का सम्मान परिणाम से नहीं, बल्कि दिशा से होना चाहिए?
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निष्कर्ष:
> "अगर सबसे तेज़ दिमाग़ ही दुनिया को अस्थिर करें — तो यह समाज की विफलता है, शिक्षक की भी, और शिक्षा की भी।"
इसलिए, ऐसे "ब्रिलिएंट" छात्रों पर गर्व करने से पहले, हमें पूछना चाहिए: "उन्होंने दुनिया को क्या दिया — डर, विनाश या दिशा?"
यदि उत्तर डर और विनाश है — तो शिक्षकों को गर्व नहीं, आत्मचिंतन करना चाहिए।
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