Monday, July 28, 2025

✊ सबसे खतरनाक – पाश



सबसे खतरनाक – पाश

(मूल कविता हिंदी में)

सबसे ख़तरनाक होता है
मुर्दा शांति से भर जाना,
न होना तड़प का,
सब कुछ सहन कर जाना,
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर आना,
सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना।

सबसे ख़तरनाक होता है
वह घड़ी जो तुम्हारी कलाई पर रुक जाए
और तुम्हें मालूम भी न हो।
सबसे ख़तरनाक होता है
बच्चों के मासूम सवालों से डर जाना।

सबसे ख़तरनाक होता है
उस लहर का होना
जिसमें सब कुछ शांत दिखाई दे
पर अंदर ही अंदर सब कुछ मर चुका हो।

सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे होने का मरा हुआ अहसास
जो तुम महसूस करो
और चुपचाप सह जाओ।


📖 भावार्थ / व्याख्या:

1. "सबसे खतरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना..."

जब इंसान अंदर से सुन्न हो जाए, कुछ भी उसे विचलित न करे — न अन्याय, न पीड़ा, न असमानता — तब वह सबसे खतरनाक स्थिति में होता है। यही "मुर्दा शांति" है, जो विद्रोह को मार देती है।


2. "सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना..."

सपने ही इंसान को इंसान बनाते हैं। जब कोई व्यक्ति सपने देखना छोड़ देता है, बदलाव की कल्पना नहीं करता, तब वो सामाजिक बदलाव का हिस्सा नहीं रह पाता।


3. "घड़ी का रुक जाना और मालूम भी न होना..."

समय के प्रति अंधत्व – जब इंसान को यह भी न समझ आए कि वह किस दिशा में जा रहा है, कितना पीछे छूट गया है – यह चेतना का अंत है।


4. "बच्चों के मासूम सवालों से डर जाना..."

जब हम बच्चों की सच्चाई भरी मासूम बातों से भी डरने लगें, तब समझो कि हम झूठ और व्यवस्था की गुलामी में पूरी तरह डूब चुके हैं।


5. "सबसे खतरनाक होता है हमारे होने का मरा हुआ अहसास..."

जब हमें खुद के अस्तित्व, अपने जीवन, अपने अधिकारों का कोई बोध ही न रहे — और हम बस 'जिए जा रहे हों' — तब हम एक चलते-फिरते शव हैं।


📌 निष्कर्ष:

पाश हमें जगाना चाहते हैं — चेतना की नींद से, आत्मा के मरने से, सपनों के खोने से।
वे कहते हैं:
"मरना इतना खतरनाक नहीं,
जितना खतरनाक है — बिना सपनों के जीते रहना!"

No comments:

Post a Comment

न्यूज़ विचार और व्यव्हार

जब मीडिया सत्ता की ढाल बने, तब जनता की पत्रकारिता ज़रूरी

जब मीडिया सत्ता की ढाल बने, तब जनता की पत्रकारिता ज़रूरी लोकतंत्र के चार स्तंभों में मीडिया को इसलिए जगह दी गई थी ताकि वह सत्ता पर निगरानी र...