डिजिटल मीडिया में काम करने वाले पत्रकारों को वेतन, नौकरी की सुरक्षा, श्रम कानूनों की सुरक्षा, और अनुबंध आधारित भेदभाव जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। मौजूदा कार्यकारी पत्रकार अधिनियम, 1955 डिजिटल पत्रकारों को कवर नहीं करता, जिससे यह एक अनियमित क्षेत्र बना हुआ है। आइए डिजिटल पत्रकारों से जुड़े श्रम अधिकारों को विस्तार से समझें।
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1. डिजिटल पत्रकारों के सामने प्रमुख चुनौतियाँ
(A) अनुबंध (Contract Basis) पर नौकरी का दबाव
डिजिटल पत्रकारों को अक्सर स्थायी (Permanent) नौकरी नहीं दी जाती और उन्हें अल्पकालिक अनुबंध (Short-Term Contract) पर रखा जाता है।
इससे नौकरी की सुरक्षा (Job Security) नहीं मिलती और उन्हें बिना किसी ठोस कारण के कभी भी हटाया जा सकता है।
(B) न्यूनतम वेतन और अन्य सुविधाओं की कमी
कई डिजिटल मीडिया संस्थान अपने पत्रकारों को न्यूनतम वेतन (Minimum Wage) से भी कम भुगतान करते हैं।
ओवरटाइम (Overtime) का भुगतान, Provident Fund (PF), Gratuity और बीमा जैसी सुविधाएँ भी नहीं दी जातीं।
(C) वर्कलोड और मानसिक तनाव
डिजिटल पत्रकारों को 24x7 काम करना पड़ता है क्योंकि ऑनलाइन न्यूज़ प्लेटफॉर्म कभी बंद नहीं होते।
रिपोर्टिंग, लेखन, वीडियो एडिटिंग, सोशल मीडिया प्रबंधन – सभी जिम्मेदारियाँ एक ही पत्रकार को दी जाती हैं।
इस वर्कलोड के कारण मानसिक तनाव (Work Stress) और बर्नआउट (Burnout) बढ़ रहा है।
(D) फ्रीलांस पत्रकारों के अधिकारों की अनदेखी
कई पत्रकार फ्रीलांस (Freelance) के रूप में डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के लिए काम करते हैं, लेकिन उन्हें कोई कानूनी सुरक्षा नहीं मिलती।
डिजिटल मीडिया कंपनियाँ फ्रीलांस पत्रकारों से कम भुगतान में खबरें लिखवाती हैं, लेकिन उन्हें कोई अतिरिक्त लाभ नहीं देतीं।
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2. डिजिटल पत्रकारों को श्रम सुरक्षा देने के लिए प्रस्तावित समाधान
(A) डिजिटल मीडिया को कार्यकारी पत्रकार अधिनियम, 1955 के तहत लाना
यदि डिजिटल पत्रकारों को कार्यकारी पत्रकारों की परिभाषा में शामिल किया जाए, तो वे न्यायसंगत वेतन, अवकाश, PF, और नौकरी की सुरक्षा प्राप्त कर सकते हैं।
(B) श्रम संहिता (Labour Codes) में डिजिटल मीडिया को शामिल करना
भारत सरकार ने चार नए श्रम संहिताएँ (Labour Codes) बनाई हैं:
1. मजदूरी संहिता (Code on Wages) – न्यूनतम वेतन सुनिश्चित करने के लिए।
2. औद्योगिक संबंध संहिता (Industrial Relations Code) – नौकरी सुरक्षा के लिए।
3. सामाजिक सुरक्षा संहिता (Social Security Code) – PF, बीमा, ग्रेच्युटी सुनिश्चित करने के लिए।
4. सुरक्षा एवं कार्यदशा संहिता (Occupational Safety Code) – कार्यस्थल पर सुरक्षा और सुविधाओं के लिए।
इन नए श्रम कानूनों में डिजिटल पत्रकारों को शामिल किया जा सकता है, जिससे उन्हें भी सुरक्षा मिलेगी।
(C) डिजिटल मीडिया वेतन बोर्ड (Digital Media Wage Board) का गठन
प्रिंट और टीवी मीडिया की तरह डिजिटल पत्रकारों के लिए भी एक वेतन बोर्ड बनाया जाए, जो न्यूनतम वेतन और अन्य लाभों को तय करे।
यह बोर्ड डिजिटल मीडिया संस्थानों को न्यूनतम वेतन देने के लिए बाध्य करेगा।
(D) फ्रीलांस पत्रकारों के अधिकारों की सुरक्षा
सरकार को फ्रीलांस पत्रकारों के लिए विशेष कानून बनाने चाहिए ताकि उन्हें भी न्यायसंगत भुगतान, बीमा, और श्रम अधिकार मिल सकें।
डिजिटल मीडिया संस्थानों को फ्रीलांस पत्रकारों के साथ अनुबंध (Contracts) को पारदर्शी बनाना चाहिए और उनके अधिकारों की रक्षा करनी चाहिए।
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3. सरकार और पत्रकार संगठनों की वर्तमान स्थिति
प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया, पत्रकार संगठनों और कुछ सांसदों ने सरकार से डिजिटल मीडिया श्रम कानून बनाने की माँग की है।
नवंबर 2021 में केंद्र सरकार ने डिजिटल मीडिया पर नियंत्रण बढ़ाने के लिए आईटी नियम बनाए, लेकिन ये पत्रकारों की नौकरी और वेतन से जुड़े नहीं हैं।
2022-24 के बीच, डिजिटल पत्रकारों के श्रम अधिकारों को लेकर कई जनहित याचिकाएँ (PILs) दायर हुई हैं।
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4. निष्कर्ष और आगे की राह
डिजिटल पत्रकारिता तेजी से बढ़ रही है, लेकिन पत्रकारों के श्रम अधिकार अभी भी अनिश्चित हैं।
सरकार को कार्यकारी पत्रकार अधिनियम, 1955 में संशोधन करके डिजिटल पत्रकारों को शामिल करना चाहिए।
डिजिटल मीडिया वेतन बोर्ड का गठन, श्रम संहिता के तहत सुरक्षा, और फ्रीलांस पत्रकारों के अधिकारों को कानूनी मान्यता देना जरूरी है।
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