यह एक कड़वी सच्चाई है कि उत्तराखंड में करोड़ों की लागत से पुल और सड़कें बन रही हैं, लेकिन वे लोग जो इनसे सबसे अधिक लाभान्वित होने चाहिए, वही पलायन करने को मजबूर हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि विकास का केंद्रभूत उद्देश्य यहां के स्थानीय निवासियों के जीवन और आजीविका को मजबूत करने के बजाय केवल भौतिक संरचनाओं तक सीमित रह गया है। जब तक इन सड़कों और पुलों से गांवों में रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं और स्वरोजगार के अवसर नहीं जुड़ते, तब तक वे केवल पलायन की गति को बढ़ाने का ही माध्यम बनेंगे।
विडंबना यह है कि:
- गांवों से मूल निवासी पलायन कर रहे हैं, और उनकी जमीनें धीरे-धीरे बाहरी लोगों के हाथों में जा रही हैं।
- जो सड़कें और पुल गांवों को जोड़ने के लिए बने हैं, वे कहीं न कहीं बाहरी निवेशकों और बड़े पूंजीपतियों के लिए रास्ता आसान कर रहे हैं।
- स्थानीय लोगों के पास संसाधन तो हैं, लेकिन वे इनके सही उपयोग के लिए संगठित नहीं हो पा रहे।
समाधान क्या हो सकता है?
- स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बढ़ाने होंगे, खासकर कृषि, जड़ी-बूटी उत्पादन, इको-टूरिज्म, और छोटे उद्योगों के माध्यम से।
- सहकारी खेती और सामुदायिक स्वायत्तता के मॉडल अपनाने होंगे ताकि गांवों की जमीनें बाहरी पूंजीपतियों के हाथों में जाने से बचें।
- सड़क और बुनियादी ढांचे का उपयोग स्थानीय व्यापार, होमस्टे, जैविक उत्पादों की आपूर्ति, और अन्य ग्रामीण उद्योगों को बढ़ाने में किया जाए।
- ग्राम पंचायतों और स्थानीय संगठनों को और अधिक अधिकार और संसाधन दिए जाएं ताकि वे विकास योजनाओं को गांववासियों के हित में लागू कर सकें।
यदि इस पर ध्यान नहीं दिया गया, तो उत्तराखंड की खूबसूरत घाटियों और पहाड़ों पर बाहरी लोगों का कब्जा हो जाएगा और मूल निवासी अपने ही घरों से बेगाने हो जाएंगे।
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