Wednesday, February 5, 2025

"उड़दी डार" (गढ़वाली लोकगीत)

यहाँ एक और गढ़वाली पारंपरिक लोकगीत के बोल प्रस्तुत हैं:

"उड़दी डार" (गढ़वाली लोकगीत)

बोल:
उड़दी डार, उड़दी डार,
चाँदनी रात में, गाऊं मैं प्यार।
घुघूती का गीत, बगिया में गूंजे,
पानी की धार, गाँव में लूंजे।

पाजेब की छमक, काजल की रंगत,
गाँव में बसी, छोरी की उमंग।
गाड़ी रै खल, बिठी रै सवारी,
घाटी में बसी, हर इक खुशियाँ सारी।

सपनों की राह, बगिया रै ओर,
गाँव रै गीत, गाओ सब यार।
उड़दी डार, उड़दी डार,
गाओ गढ़वाली प्यार रै हार।

अर्थ:
यह गीत गढ़वाली प्रेम और खुशी को दर्शाता है। इसमें चाँदनी रात, घुघूती का गीत, और पाजेब की छनक का वर्णन है। गीत में गढ़वाली समाज की सादगी, रिश्तों की खूबसूरती और वहाँ के जीवन के मधुर रंगों को महसूस किया जा सकता है। यह गीत गाँव की खुशियों और प्रेम को एक उत्सव के रूप में प्रस्तुत करता है।


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