"छोरी गैंठाळी" (गढ़वाली पारंपरिक लोकगीत)
बोल:
छोरी गैंठाळी, कान मा कुण्डल,
घाघरा लहरायो, छन-छन छनकल।
नथुली चमके, पाजेब बाजे,
मन मेरो खो गयो ती सज धज मा।
धान रौं खेत, पाणी रौं धारा,
पाखी रौं गीत, मन भुलायो सारा।
घुघूती बासूती, गूँजूं गगन मा,
मेरु पहाड़, मेरो मन रौं छाँव मा।
बुरांश लाल, न्यौली गाये,
हरे-भरे वन, मन लुभाये।
छोरी रौं हंसी, फूल रौं बहार,
गढ़वाल मेरो, सुन्दर अपार।
अर्थ:
इस गीत में गढ़वाल की पहाड़ी छोरियों (लड़कियों) की पारंपरिक वेशभूषा और उनकी सुंदरता का वर्णन किया गया है। उनके गहनों की छन-छन, खेतों की हरियाली, और पहाड़ी संस्कृति की रंगीन झलक को दर्शाता है। गीत में प्रकृति और संस्कृति के सुंदर संगम को बड़े ही मधुर भावों में पिरोया गया है।
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