"म्यरि चालि कु गौं" (गढ़वाली पारंपरिक लोकगीत)
बोल:
म्यरि चालि कु गौं, पांखी उड़न लाग्यां,
हरी-भरी घाटी मां, न्योली गूंजन लाग्यां।
धान रौं खेत, बुरांश फुल्यूं लाल,
मन मेरू खो गयो, मेरू प्यरो गढ़वाल।
प्यौंली रौं गंध, मंद-मंद हवा,
नदी-गदेरा, छन-छन रौं रवा।
छाना रौं घर, पाथर रौं बाट,
त्यूं देखूं सुंदर, मेरो मन भुलाट।
नंदा देवी रौं छाया, त्रिशूल रौं तेज,
गढ़वाली रीत-रिवाज, संस्कृति रौं साज।
मेरो मन रौं स्वर्ग, मेरो गढ़वाल छ,
जन्मुं फेर भी, त मेरू गौं यैं हाल छ।
अर्थ:
यह गीत गढ़वाल के गाँवों की सरलता, प्राकृतिक सुंदरता और सांस्कृतिक समृद्धि का चित्रण करता है। गीत में पहाड़ों की हरी-भरी घाटियाँ, बुरांश के लाल फूल, धान के खेत, और न्यौली की मधुर आवाज़ को बड़े ही प्यार से व्यक्त किया गया है। इसमें गढ़वाली संस्कृति और परंपराओं के प्रति गहरा प्रेम और सम्मान झलकता है।
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