"चांचरी" (गढ़वाली लोकगीत)
बोल:
चांचरी गाओ, चांचरी गाओ,
घुंघरू बांधो, सज धजो।
घाघरा लहरायो, पाजेब थमायो,
ललित रै रंग में रंग जाओ।
वसंत की ऋतु आई, बुरांश फुलायो,
घुघूती की बोली दिल को ललायो।
खेतों में हरियाली, बगिया में रंग,
गांव की गलियों में बजी चंचल धंग।
मलनी रानी आई, लाया फूलों का गहना,
पानी की नदियाँ, गा रहे हैं सन्ना।
नदी-नालों में रिझी रिहारी,
गढ़वाल रै गौरव की सवारी।
मन में बस जायो, गढ़वाल का प्यार,
गांव की खुशियाँ, हर दिल में बसा हार।
चांचरी गाओ, चांचरी गाओ,
गढ़वाल के गीतों में लहराओ।
अर्थ:
यह गीत गढ़वाल की पारंपरिक खुशियों और प्राकृतिक सौंदर्य का चित्रण करता है। "चांचरी" एक प्रकार का लोकगीत है, जो सामान्यतः गढ़वाली समाज में उत्सवों, त्योहारों या खुशी के अवसरों पर गाया जाता है। गीत में बुरांश के फूलों, खेतों की हरियाली, और गांव की गलियों की मस्ती का वर्णन है। यह गीत गढ़वाल के स्वाभिमान, प्यार और संस्कृति की गहरी समझ को दर्शाता है।
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