"पेड़ गांव रह जाते हैं और फल शहर आ जाते हैं" एक गहरी और अर्थपूर्ण कहावत है, जो समाज, अर्थव्यवस्था, और विकास के असंतुलन को दर्शाती है। इसका भावार्थ यह है कि:
- प्राकृतिक संसाधन और उत्पादन ग्रामीण क्षेत्रों में होते हैं, लेकिन उनका लाभ शहरी क्षेत्रों को मिलता है।
- मेहनत करने वाले किसान और ग्रामीण लोग पेड़ों की तरह अपनी जड़ों से जुड़े रहते हैं, पर उनकी मेहनत के फल का असली फायदा व्यापारी, उद्योगपति या शहरी बाजार उठा लेते हैं।
- यह कहावत ग्रामीण-शहरी असमानता और आर्थिक विसंगति को भी दर्शाती है, जहाँ गाँव उत्पादन केंद्र होते हैं, पर समृद्धि और सुविधाएं शहरों में केंद्रित रहती हैं।
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