"चैत की चैतवाली" (गढ़वाली पारंपरिक गीत)
बोल:
चैत की चैतवाली,
फूलंे फूली रौंलि बारी।
घुघूती बासूती आई,
लै रौं माया की किलकारी।
न्यौली गूंजे गगन मां,
बुरांश लाल-लाल खिलां।
मन मेरो खो गयो छ,
ती पहाड़ी गलियों मां।
नदी गाड गदेरों की,
मधुर-सी बोली बगैर।
मेरो मन छ थामि राख,
गढ़वाल रौं रंग ल्यैर।
अर्थ:
यह गीत गढ़वाल के वसंत ऋतु (चैत) के सौंदर्य का वर्णन करता है। इसमें फूलों के खिलने, पक्षियों की मधुर आवाज़, बुरांश के लाल फूलों, और पहाड़ी गलियों के आकर्षण का जिक्र है। गीत में गढ़वाल की प्राकृतिक सुंदरता और भावनात्मक जुड़ाव को बड़े ही सादगी भरे शब्दों में पिरोया गया है।
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